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Monday, March 10, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 15 पुरुषोत्तमयोग

     ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌ । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌ ॥
  श्री भगवान बोले- आदिपुरुष परमेश्वर रूप मूल वाले और ब्रह्मारूप मुख्य शाखा वाले जिस संसार रूप पीपल वृक्ष को अविनाशी कहते हैं, तथा वेद जिसके पत्ते  कहे गए हैं, उस संसार रूप वृक्ष को जो पुरुष मूलसहित सत्त्व से जानता है, वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है। ॥1॥
आदिपुरुष नारायण वासुदेव भगवान ही नित्य और अनन्त तथा सबके आधार होने के कारण और सबसे ऊपर नित्यधाम में सगुणरूप से वास करने के कारण ऊर्ध्व नाम से कहे गए हैं और वे मायापति, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही इस संसाररूप वृक्ष के कारण हैं, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'ऊर्ध्वमूलवाला' कहते हैं
  उस आदिपुरुष परमेश्वर से उत्पत्ति वाला होने के कारण तथा नित्यधाम से नीचे ब्रह्मलोक में वास करने के कारण, हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मा को परमेश्वर की अपेक्षा 'अधः' कहा है और वही इस संसार का विस्तार करने वाला होने से इसकी मुख्य शाखा है, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'अधःशाखा वाला' कहते हैं
इस वृक्ष का मूल कारण परमात्मा अविनाशी है तथा अनादिकाल से इसकी परम्परा चली आती है, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'अविनाशी' कहते हैं
इस वृक्ष की शाखा रूप ब्रह्मा से प्रकट होने वाले और यज्ञादि कर्मों द्वारा इस संसार वृक्ष की रक्षा और वृद्धि करने वाले एवं शोभा को बढ़ाने वाले होने से वेद 'पत्ते' कहे गए हैं
भगवान्‌ की योगमाया से उत्पन्न हुआ संसार क्षणभंगुर, नाशवान और दुःखरूप है, इसके चिन्तन को त्याग कर केवल परमेश्वर ही नित्य-निरन्तर, अनन्य प्रेम से चिन्तन करना 'वेद के तात्पर्य को जानना' है
The Supreme Lord said: They speak of the eternal banyan tree that has its origin above in the Supreme Being (ParBrahm) and its branches below in the cosmos, and whose leaves are the Vedic hymns. One who understands this tree is a knower of the Vedas.

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥
 उस संसार वृक्ष की तीनों गुणोंरूप जल के द्वारा बढ़ी हुई एवं विषय-भोग रूप कोंपलोंवाली देव, मनुष्य और तिर्यक्‌ आदि योनिरूप शाखाएँ  नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं तथा मनुष्य लोक में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली अहंता-ममता और वासना रूप जड़ें भी नीचे और ऊपर सभी लोकों में व्याप्त हो रही हैं। ॥2॥
 शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध -ये पाँचों स्थूलदेह और इन्द्रियों की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण उन शाखाओं की 'कोंपलों' के रूप में कहे गए हैं।
मुख्य शाखा रूप ब्रह्मा से सम्पूर्ण लोकों सहित देव, मनुष्य और तिर्यक्‌ आदि योनियों की उत्पत्ति और विस्तार हुआ है, इसलिए उनका यहाँ 'शाखाओं' के रूप में वर्णन किया है
अहंता, ममता और वासनारूप मूलों को केवल मनुष्य योनि में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली कहने का कारण यह है कि अन्य सब योनियों में तो केवल पूर्वकृत कर्मों के फल को भोगने का ही अधिकार है और मनुष्य योनि में नवीन कर्मों के करने का भी अधिकार है
The branches of this cosmic tree of Maya (Illusion) spread all over the cosmos. The tree is nourished by three modes (Gunas) of material Nature (Prakriti); sense pleasures are its sprouts; and its roots of ego and desires stretch below in the human world, causing Karmic bondage. (15.02)

   न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा । अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्‍गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥
  इस संसार वृक्ष का स्वरूप जैसा कहा है वैसा यहाँ विचार काल में नहीं पाया जाता  क्योंकि न तो इसका आदि है और न अन्त है तथा न इसकी अच्छी प्रकार से स्थिति ही है  इसलिए इस अहंता, ममता और वासनारूप अति दृढ़ मूलों वाले संसार रूप पीपल के वृक्ष को दृढ़ वैराग्य रूप (ब्रह्मलोक तक के भोग क्षणिक और नाशवान हैं, ऐसा समझकर, इस संसार के समस्त विषयभोगों में सत्ता, सुख, प्रीति और रमणीयता का न भासना ही 'दृढ़ वैराग्यरूप शस्त्र' है) शस्त्र द्वारा काटकर ....॥3॥
(इस संसार का जैसा स्वरूप शास्त्रों में वर्णन किया गया है और जैसा देखा-सुना जाता है, वैसा तत्त्व ज्ञान होने के पश्चात नहीं पाया जाता, जिस प्रकार आँख खुलने के पश्चात स्वप्न का संसार नहीं पाया जाता
इसका आदि नहीं है, यह कहने का प्रयोजन
इसका अन्त नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि इसकी परम्परा कब तक चलती रहेगी, इसका कोई पता नहीं है यह है कि इसकी परम्परा कब से चली आ रही है, इसका कोई पता नहीं है
इसकी अच्छी प्रकार स्थिति भी नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि वास्तव में यह क्षणभंगुर और नाशवान है
स्थावर, जंगमरूप यावन्मात्र संसार के चिन्तन का तथा अनादिकाल से अज्ञान द्वारा दृढ़ हुई अहंता, ममता और वासना रूप मूलों का त्याग करना ही संसार वृक्ष का अवान्तर 'मूलों के सहित काटना' है।)
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥
 उसके पश्चात उस परम-पदरूप परमेश्वर को भलीभाँति खोजना चाहिए, जिसमें गए हुए पुरुष फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिस परमेश्वर से इस पुरातन संसार वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुष नारायण के मैं शरण हूँ- इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वर का मनन और निदिध्यासन करना चाहिए॥4॥
How to cut the tree of attachment and attain salvation by taking refuge in God
The real form of this tree is not perceptible here on earth, nor is its beginning, end, or existence. Having cut the firm roots --- the desires --- of this tree by the mighty ax of Self-knowledge and detachment; thus thinking: "I take refuse in that very primal person from which this primal manifestation comes forth", seek that supreme abode from where one does not come back (to the mortal world) again. (15.03-04)


निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्‌ ॥
 जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्ति रूप दोष को जीत लिया है, जिनकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं- वे सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं॥5॥
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥
 जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही, वही मेरा परम धाम  है॥6॥
The wise reach that eternal goal, who are free from pride and delusion, who have conquered the evil of attachment, who constantly dwell in the Supreme Self with all lust (Kaam) completely stilled, and who are free from dualities of pleasure and pain. (15.05) 
The sun does not illumine there, nor the moon, nor the fire. That is My supreme abode. Having reached there people do not come back (to the temporal world). (15.06)

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥
  इस देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है और वही इन प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है॥7॥
जैसे विभागरहित स्थित हुआ भी महाकाश घटों में पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है, वैसे ही सब भूतों में एकीरूप से स्थित हुआ भी परमात्मा पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है, इसी से देह में स्थित जीवात्मा को भगवान ने अपना 'सनातन अंश' कहा है
The eternal individual soul (Jeevaatma) in the body of living beings is, indeed, My integral part. It associates with the six sensory faculties of perception --- including the mind --- and activates them. (15.07)


  शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्‌ ॥
 वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादिका स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इन मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है- उसमें जाता है॥8॥
Just as the air takes aroma away from the flower; similarly, the individual soul (Jeevaatma) takes the six sensory faculties from the physical body it casts off during death to the new physical body it acquires in reincarnation (by the power of Karm).  (15.08)

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥
 यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचा को तथा रसना, घ्राण और मन को आश्रय करके -अर्थात इन सबके सहारे से ही विषयों का सेवन करता है॥9॥
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्‌ । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥
 शरीर को छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को अथवा विषयों को भोगते हुए को इस प्रकार तीनों गुणों से युक्त हुए को भी अज्ञानीजन नहीं जानते, केवल ज्ञानरूप नेत्रों वाले विवेकशील ज्ञानी ही तत्त्व से जानते हैं॥10॥
The living entity (Jeev) enjoys sense pleasures using six sensory faculties of hearing, touch, sight, taste, smell, and mind. The ignorant cannot perceive Jeev departing from the body, nor staying in the body and enjoying sense pleasures by associating with the modes of material Nature. But those who have the eye of Self-knowledge can see it. (15.09-10)

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्‌ । यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥
  यत्न करने वाले योगीजन भी अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को तत्त्व से जानते हैं, किन्तु जिन्होंने अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं जानते॥11॥
The yogis, striving for perfection, behold the living entity (Jeev) abiding in their inner psyche (as consciousness), but the ignorant and those whose inner psyche is not pure; even though striving, do not perceive Him. (15.11)

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्‌ । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्‌ ॥
  सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और जो अग्नि में है- उसको तू मेरा ही तेज जान॥12॥
Know the light energy to be Mine that comes from the sun and illumines the whole world, and is in the moon and in fire.  (15.12)

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥
 और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ और रसस्वरूप अर्थात अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण ओषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ॥13॥ 
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्‌ ॥
 मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाला प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर अग्नि रूप होकर चार

(भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य, ऐसे चार प्रकार के अन्न होते हैं, उनमें जो चबाकर खाया जाता है, वह 'भक्ष्य' है- जैसे रोटी आदि। जो निगला जाता है, वह 'भोज्य' है- जैसे दूध आदि तथा जो चाटा जाता है, वह 'लेह्य' है- जैसे चटनी आदि और जो चूसा जाता है, वह 'चोष्य' है- जैसे ईख आदि)
प्रकार के अन्न को पचाता हूँ॥14॥
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्‌ ॥
 मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (विचार द्वारा बुद्धि में रहने वाले संशय, विपर्यय आदि दोषों को हटाने का नाम 'अपोहन' है) होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य (सर्व वेदों का तात्पर्य परमेश्वर को जानने का है, इसलिए सब वेदों द्वारा 'जानने के योग्य' एक परमेश्वर ही है) हूँ तथा वेदान्त का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ॥15॥
Entering the earth, I support all beings with My energy. Becoming the sap-giving moon, I nourish all the plants. (15.13) Becoming the digestive fire, I remain in the body of all living beings. Uniting with vital life forces (Praan and Apaan), I digest all types of food. (15.14) And I am seated in the inner psyche of all beings. Memory, Self-knowledge, and removal of doubts and wrong notions (about the Eternal Being by reasoning, or in trance (Samaadhi)) come from Me. I am, in truth, that which is to be known by the study of all the Vedas. I am, indeed, the author of the Vedant and the knower of the Vedas. (15.15) 

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥
 इस संसार में नाशवान और अविनाशी भी ये दो प्रकार के पुरुष हैं। इनमें सम्पूर्ण भूतप्राणियों के शरीर तो नाशवान और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है॥16॥
(गीता अध्याय 7 श्लोक 4-5 में जो अपरा और परा प्रकृति के नाम से कहे गए हैं तथा अध्याय 13 श्लोक 1 में जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के नाम से कहे गए हैं, उन्हीं दोनों का यहाँ क्षर और अक्षर के नाम से वर्णन किया है)

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
 इन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा- इस प्रकार कहा गया है॥17॥
the supreme spirit, spirit and the individual soul
There are two entities (Purushas) in the cosmos: The changeable or temporal Divine Beings (Kshar Purush), and the unchangeable Eternal Being (Brahm, Akshar Purush). All created beings are subject to change, but the Eternal Being does not change. (15.16) There is another Supreme Personality of the Godhead (beyond both the temporal and the eternal) called the Absolute Reality or Paramaatma, who sustains both the temporal and the eternal (Kshar and Akshar) by pervading all three planetary spheres (Lokas) as the eternal Lord (Ishvar). (15.17)

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥
 क्योंकि मैं नाशवान जड़वर्ग- क्षेत्र से तो सर्वथा अतीत हूँ और अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ॥18॥
Because I am beyond both the temporal (Kshar) and the eternal (Akshar); therefore, I am known in this world and in the Veda as the Supreme Being (ParBrahm, Paramaatma, Purushottam, the Absolute, Truth, Sat, Supersoul, etc.). (15.18)

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्‌ । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
 भारत! जो ज्ञानी पुरुष मुझको इस प्रकार तत्त्व से पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरन्तर मुझ वासुदेव परमेश्वर को ही भजता है॥19॥
The wise, who truly understand Me as the Supreme Being (Purushottam), know everything and worship Me wholeheartedly, O Arjun.  (15.19)










श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 14 गुणत्रयविभागयोग

   # ज्ञानों में भी अतिउत्तम  परम ज्ञान #
  मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्‌ ।  सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥
  हे अर्जुन! मेरी महत्‌-ब्रह्मरूप मूल-प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है अर्थात गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनि में चेतन समुदायरूप गर्भ को स्थापन करता हूँ। उस जड़-चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पति होती है॥3॥
    सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।  तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥
 हे अर्जुन! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर्थात शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं, प्रकृति तो उन सबकी गर्भधारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापन करने वाला पिता हूँ॥4॥
All beings are born from the union of spirit and matter
My material Nature (Prakriti, mother nature) is the womb of creation wherein I place the seed (of Consciousness or Purush) from which all beings are born, O Arjun. (See also 9.10) (14.03) Whatever forms are produced in all different wombs, O Arjun, the material Nature (Prakriti) is their (body-giving) mother; and I, the Spiritual Being or Purush, am the (seed or life-giving) father. (14.04)

    सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्‌ ॥
 हे अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण -ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं॥5॥
Sattv or goodness, Rajas or passion, activity; and Tamas or ignorance, inertia --- these three modes (Ropes, Gunas) of material Nature (Prakriti) fetter the eternal individual soul (Jeev) to the body, O Arjun. (14.05)

     तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्‌ । सुखसङ्‍गेन बध्नाति ज्ञानसङ्‍गेन चानघ ॥
 हे निष्पाप! उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख के सम्बन्ध से और ज्ञान के सम्बन्ध से अर्थात उसके अभिमान से बाँधता है॥6॥
Of these, the mode of goodness (Sattv) is illuminating and good, because it is pure. Sattv fetters the living entity (Jeev) by attachment to happiness and knowledge, O sinless Arjun. (14.06)

    जो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्‍गसमुद्भवम्‌ । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्‍गेन देहिनम्‌ ॥
 हे अर्जुन! रागरूप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को कर्मों और उनके फल के सम्बन्ध में बाँधता है॥7॥
Arjun, know that the mode of passion (Rajas) is characterized by intense craving and is the source of desire and attachment. Rajas binds the living entity (Jeev) by attachment to (the fruits of) work. (14.07)

  तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्‌ । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥
  हे अर्जुन! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तो अज्ञान से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद (इंद्रियों और अंतःकरण की व्यर्थ चेष्टाओं का नाम 'प्रमाद' है), आलस्य (कर्तव्य कर्म में अप्रवृत्तिरूप निरुद्यमता का नाम 'आलस्य' है) और निद्रा द्वारा बाँधता है॥8॥
Know, O Arjun, that the mode of ignorance (Tamas) --- deluder of the living entity (Jeev)--- is born of inertia. Tamas binds Jeev by carelessness, laziness, and excessive sleep. (14.08)

    सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥
 हे अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में तथा तमोगुण तो ज्ञान को ढँककर प्रमाद में भी लगाता है॥9॥
O Arjun, the mode of goodness attaches one to happiness (of learning and knowing the Eternal Being); the mode of passion attaches to action; and the mode of ignorance attaches to negligence by covering Self-knowledge. (14.09)

  रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥
  हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण होता है अर्थात बढ़ता है॥10॥
Goodness prevails by suppressing passion and ignorance; passion prevails by suppressing goodness and ignorance; and ignorance prevails by suppressing goodness and passion, O Arjun. (14.10)

When the light of Self-knowledge illuminates all the senses (or gates) in the body, then it should be known that goodness is predominant. (14.11) O Arjun, when passion is predominant; greed, activity, undertaking of selfish works, restlessness, excitement, etc. arise. (14.12) O Arjun, when inertia is predominant; ignorance, inactivity, carelessness, delusion, etc. arise. (14.13) 

जब यह मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है॥14॥
रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ मनुष्य कीट, पशु आदि मूढ़योनियों में उत्पन्न होता है॥15॥

    कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्‌ । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्‌ ॥
श्रेष्ठ कर्म का तो सात्त्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है॥16॥
   The fruit of good action is said to be beneficial and pure; the fruit of passionate action is pain; and the fruit of ignorant action is laziness. (14.16)
    सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥
 सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुण से निःसन्देह लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद और मोह  उत्पन्न होते हैं और अज्ञान भी होता है॥17॥
  Self-knowledge arises from the mode of goodness; greed arises from the mode of passion; and negligence, delusion, and slowness of mind arise from the mode of ignorance. (14.17)


सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं,
रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात मनुष्य लोक में ही रहते हैं और
तमोगुण के कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादि में स्थित तामस पुरुष अधोगति को अर्थात कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते हैं॥18॥

    नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥
 जिस समय दृष्टा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यन्त परे सच्चिदानन्दघनस्वरूप मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानता है, उस समय वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है॥19॥
When visionaries perceive no doer other than the powers of Eternal Being --- the modes (Gunas) of material Nature; and know That which is above and beyond these Gunas, then they attain salvation (Mukti).



  गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्‌ । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥
 यह पुरुष शरीर की (बुद्धि, अहंकार और मन तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत, पाँच इन्द्रियों के विषय- इस प्रकार इन तेईस तत्त्वों का पिण्ड रूप यह स्थूल शरीर प्रकृति से उत्पन्न होने वाले गुणों का ही कार्य है, इसलिए इन तीनों गुणों को इसी की उत्पत्ति का कारण कहा है) उत्पत्ति के कारणरूप इन तीनों गुणों को उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है॥20॥
When one transcends (or rises above) the three modes of material Nature that create (and/or originate in) the body, one attains immortality or salvation (Mukti) and is freed from the pains of birth, old age, and death. (14.20)


जो निरन्तर आत्म भाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समान भाव वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला और अपनी निन्दा-स्तुति में भी समान भाव वाला है॥24॥
जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता है॥25॥
और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति योग द्वारा मुझको निरन्तर भजता है, वह भी इन तीनों गुणों को भलीभाँति लाँघकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होने के लिए योग्य बन जाता है॥26॥
(केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर वासुदेव भगवान को ही अपना स्वामी मानता हुआ, स्वार्थ और अभिमान को त्याग कर श्रद्धा और भाव सहित परम प्रेम से निरन्तर चिन्तन करने को 'अव्यभिचारी भक्तियोग' कहते हैं)
क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का आश्रय मैं हूँ॥27॥



Sunday, March 9, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 13 क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग

   अर्जुन  उवाच प्रकृतिं  पुरुषं  चैव  क्षेत्रम  क्षेत्रक्षमेव एतद् वेंदितुं  इच्छामि  जननं    जनेयं  च  केसव
Arjuna said: O my dear Krishna, I wish to know about prakriti [nature], purusha [the enjoyer], and the field and the knower of the field, and of knowledge and the object of knowledge.
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥
 श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! यह शरीर 'क्षेत्र'  इस नाम से कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसको 'क्षेत्रज्ञ' इस नाम से उनके तत्व को जानने वाले ज्ञानीजन कहते हैं॥1॥
The Supreme Personality of Godhead said: This body, O son of Kunti, is called the field, and one who knows this body is called the knower of the field.

O scion of Bharata, you should understand that I am also the knower in all bodies, and to understand this body and its knower is called knowledge. That is My opinion.
 क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥
हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ अर्थात जीवात्मा भी मुझे ही को जान और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को अर्थात विकार सहित प्रकृति और पुरुष का जो तत्व से जानना है  वह ज्ञान है- ऐसा मेरा मत है॥
 O Arjun, know Me to be the creator of all the creation. The true understanding of both the creator and the creation is considered by Me to be the transcendental (or metaphysical) knowledge.

          महाभूतान्यहङ्‍कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥
  पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच इन्द्रियों के विषय अर्थात शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध॥5॥
    इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्‍घातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्‌ ॥
  तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देहका पिण्ड, चेतना (शरीर और अन्तःकरण की एक प्रकार की चेतन-शक्ति।) और धृति -- इस प्रकार विकारों (पाँचवें श्लोक में कहा हुआ तो क्षेत्र का स्वरूप समझना चाहिए और इस श्लोक में कहे हुए इच्छादि क्षेत्र के विकार समझने चाहिए।) के सहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया॥
The primary material Nature (Aadi Prakriti or Avyakt), cosmic intellect (Mahat), "I" consciousness or ego, five basic elements, ten organs, mind, five sense objects; and desire, hatred, pleasure, pain, the physical body, consciousness, and resolve --- thus the entire field has been briefly described with its transformations.
     अमानित्वमदम्भित्व- महिंसा क्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं  स्थैर्यमात्मविनिग्रहः
  श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदि की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, अन्तःकरण की स्थिरता और मन-इन्द्रियों सहित शरीर का निग्रह॥

      इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम- नहंकार एव च । जन्ममृत्युजराव्याधि दुःखदोषानुदर्शनम् ॥
   इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों में आसक्ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना॥

असक्तिरनभिष्वङ्गः  पुत्रदारगृहादिषु । नित्यं च समचित्तत्व- मिष्टानिष्टोपपत्तिषु 
पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव, ममता का न होना तथा प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना॥
 मयि चानन्ययोगेन  भक्तिरव्यभिचारिणी । विविक्तदेशसेवित्व- मरतिर्जनसंसदि ॥
मुझ परमेश्वर में अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति
(केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर को ही अपना स्वामी मानते हुए स्वार्थ और अभिमान का त्याग करके, श्रद्धा और भाव सहित परमप्रेम से भगवान का निरन्तर चिन्तन करना 'अव्यभिचारिणी' भक्ति है)
तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना॥
 अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं  तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्त- मज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥
अध्यात्म ज्ञान में
(जिस ज्ञान द्वारा आत्मवस्तु और अनात्मवस्तु जानी जाए, उस ज्ञान का नाम 'अध्यात्म ज्ञान' है)
नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को ही देखना- यह सब ज्ञान है और
जो इसके विपरीत है वह अज्ञान है- ऐसा कहा है॥
Humility,   modesty,     nonviolence,      forgiveness,       honesty,      service to guru,      purity (of thought, word, and deed),   steadfastness,   self-control; and    aversion towards sense objects,    absence of ego; constant reflection on pain and suffering inherent in birth, old age, disease, and death; (13.07-08)
detached attachment with family members, home, etc.;      unfailing calmness upon attainment of the desirable and the undesirable; and     unswerving devotion to Me through single-minded contemplation, taste for solitude,   distaste for social gatherings and gossips;     steadfastness in acquiring the knowledge of Eternal Being (Brahm), and     seeing the omnipresent Supreme Being (ParBrahm, Krishn) everywhere --- this is said to be knowledge. That which is contrary to this is ignorance. (13.09-11)
            ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि  यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते । अनादि मत्परं ब्रह्म  न सत्तन्नासदुच्यते ॥
  जो जानने योग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा। वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत्‌ ही कहा जाता है, न असत्‌ ही॥
I shall fully describe the object of knowledge --- knowing which one attains immortality. The beginningless Supreme Being (ParBrahm) is said to be neither eternal (Sat) nor temporal (Asat).

           सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।सर्वतः श्रुतिमल्लोके  सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
 वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है, क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। 
(आकाश जिस प्रकार वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी का कारण रूप होने से उनको व्याप्त करके स्थित है, वैसे ही परमात्मा भी सबका कारण रूप होने से सम्पूर्ण चराचर जगत को व्याप्त करके स्थित है) The Eternal Being (Brahm) has His hands, feet, eyes, head, mouth, and ears everywhere, because He is all-pervading and omnipresent.
                 सर्वेन्द्रियगुणाभासं  सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव  निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥
     वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाला है॥
He is the perceiver of all sense objects without the physical sense organs; unattached, and yet the sustainer of all; devoid of three modes (Gunas) of material Nature (Prakriti), and yet the enjoyer of the Gunas of Prakriti (by becoming a living entity (Jeev)).
                  बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञयं दूरस्थं चान्तिके च तत्‌ ॥
    वह चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है। और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय (जैसे सूर्य की किरणों में स्थित हुआ जल सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है, वैसे ही सर्वव्यापी परमात्मा भी सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है) है तथा अति समीप में (वह परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण और सबका आत्मा होने से अत्यन्त समीप है) और दूर में (श्रद्धारहित, अज्ञानी पुरुषों के लिए न जानने के कारण बहुत दूर है) भी स्थित वही है॥

He is inside as well as outside all beings, animate and inanimate. He is incomprehensible because of His subtlety. And because of His omnipresence, He is very near --- residing in one’s inner psyche; as well as far away --- in the Supreme Abode (ParamDhaam).


          अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌ । भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥
   वह परमात्मा विभागरहित एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण होने पर भी चराचर सम्पूर्ण भूतों में विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है 
(जैसे महाकाश विभागरहित स्थित हुआ भी घड़ों में पृथक-पृथक के सदृश प्रतीत होता है, वैसे ही परमात्मा सब भूतों में एक रूप से स्थित हुआ भी पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है) 
तथा वह जानने योग्य परमात्मा विष्णुरूप से भूतों को धारण-पोषण करने वाला और रुद्ररूप से संहार करने वाला तथा ब्रह्मारूप से सबको उत्पन्न करने वाला है॥
He is undivided, and yet appears to exist as if divided in beings. He, the object of knowledge, appears as: Brahmaa, the creator; Vishnu, the sustainer; and Shiva, the destroyer of all beings.


          ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्‌ ॥
   वह परब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति  एवं माया से अत्यन्त परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोधस्वरूप, जानने के योग्य एवं तत्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है॥
ParBrahm, the Supreme Person, is the source of all light. He is said to be beyond darkness (of ignorance or Maya). He is the Self-knowledge, the object of Self-knowledge, and seated in the inner psyche (or the causal heart as consciousness  of all beings, He is to be realized by Self-knowledge (Jnaan, Taaratamya Jnaan, Brahm-vidyaa).
      इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥
  इस प्रकार क्षेत्र (श्लोक 5-6 में विकार सहित क्षेत्र का स्वरूप कहा है) तथा ज्ञान (श्लोक 7 से 11 तक ज्ञान अर्थात ज्ञान का साधन कहा है।) और जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप (श्लोक 12 से 17 तक ज्ञेय का स्वरूप कहा है) संक्षेप में कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्व से जानकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है॥
Thus the creation as well as the knowledge and the object of knowledge have been briefly described by Me. Understanding this, My devotee attains My supreme abode.
       प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्‌यनादी उभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्‌ ॥
   प्रकृति और पुरुष- इन दोनों को ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारों को तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न जान॥
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥
 कार्य (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध -इनका नाम 'कार्य' है) और
करण (बुद्धि, अहंकार और मन तथा श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और घ्राण एवं वाक्‌, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा- इन 13 का नाम 'करण' है) को उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और
जीवात्मा सुख-दुःखों के भोक्तपन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है॥
A description of the supreme spirit, spirit, material nature, and the individual souls

Know that both the material Nature (Prakriti) and the Spiritual Being (Purush) are beginningless. All manifestations and three dispositions of mind and matter, called modes or Gunas, are born of Prakriti. Prakriti is said to be the cause of production of the physical body and the eleven organs (of perception and action). Purush (Consciousness, Spirit) is said to be the cause of experiencing pleasure and pain.

    पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्‍क्ते प्रकृतिजान्गुणान्‌ । कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥
 प्रकृति में 
(प्रकृति शब्द का अर्थ गीता अध्याय 7 श्लोक 14 में कही हुई भगवान की त्रिगुणमयी माया समझना चाहिए) 
स्थित ही पुरुष प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है और इन गुणों का संग ही इस जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है। 
(सत्त्वगुण के संग से देवयोनि में एवं रजोगुण के संग से मनुष्य योनि में और तमो गुण के संग से पशु आदि नीच योनियों में जन्म होता है।)॥21॥
 Spiritual Being (Purush) enjoys three modes (Gunas) of material Nature (Prakriti) by associating with Prakriti. Attachment to the Gunas (due to ignorance caused by previous Karm) is the cause of birth of the living entity (Jeev) in good and evil wombs. (13.21)
      उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥
 इस देह में स्थित यह आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है। वह साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता, सबका धारण-पोषण करने वाला होने से भर्ता, जीवरूप से भोक्ता, ब्रह्मा आदि का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होने से परमात्मा- ऐसा कहा गया है॥22॥
Eternal Being (Brahm, Atma, Spirit) in the body is also called the witness, the guide, the supporter, the enjoyer, the great Lord, and also the Supreme Self. (13.22)


   य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥
 इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य तत्व से जानता है
(दृश्यमात्र सम्पूर्ण जगत माया का कार्य होने से क्षणभंगुर, नाशवान, जड़ और अनित्य है तथा
 जीवात्मा नित्य, चेतन, निर्विकार और अविनाशी एवं शुद्ध, बोधस्वरूप, सच्चिदानन्दघन परमात्मा का ही सनातन अंश है, इस प्रकार समझकर सम्पूर्ण मायिक पदार्थों के संग का सर्वथा त्याग करके परम पुरुष परमात्मा में ही एकीभाव से नित्य स्थित रहने का नाम उनको 'तत्व से जानना' है)
वह सब प्रकार से कर्तव्य कर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता॥23॥
They who truly understand Spiritual Being (Purush) and the material Nature (Prakriti) with its three modes (Gunas) are not born again, regardless of their way of life. (13.23)


    ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । अन्ये साङ्‍ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥
 उस परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि से ध्यान (जिसका वर्णन गीता अध्याय 6 में श्लोक 11 से 32 तक विस्तारपूर्वक किया है) द्वारा हृदय में देखते हैं,
अन्य कितने ही ज्ञानयोग (जिसका वर्णन गीता अध्याय 2 में श्लोक 11 से 30 तक विस्तारपूर्वक किया है) द्वारा और
 दूसरे कितने ही कर्मयोग (जिसका वर्णन गीता अध्याय 2 में श्लोक 40 से अध्याय समाप्तिपर्यन्त विस्तारपूर्वक किया है) द्वारा देखते हैं अर्थात प्राप्त करते हैं॥24॥
Some perceive the supersoul (Paramaatma) in their inner psyche through mind and intellect that have been purified either by meditation, or by metaphysical knowledge, or by KarmaYog. (13.24)

   यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति । तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
 जिस क्षण यह पुरुष भूतों के पृथक-पृथक भाव को एक परमात्मा में ही स्थित तथा उस परमात्मा से ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, उसी क्षण वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है॥
The moment one discovers the diverse variety of beings and their ideas abiding in One and coming out from That alone, one attains the Supreme Being (ParBrahm). (13.30)
क्षेत्र को जड़, विकारी, क्षणिक और नाशवान तथा क्षेत्रज्ञ को नित्य, चेतन, अविकारी और अविनाशी जानना ही 'उनके भेद को जानना' है
   क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्‌ ॥
 इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को
 (क्षेत्र को जड़, विकारी, क्षणिक और नाशवान तथा क्षेत्रज्ञ को नित्य, चेतन, अविकारी और अविनाशी जानना ही 'उनके भेद को जानना' है) 
तथा कार्य सहित प्रकृति से मुक्त होने को जो पुरुष ज्ञान नेत्रों द्वारा तत्व से जानते हैं, वे महात्माजन परम ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं॥34॥

They attain the Supreme, who perceive the difference between creation (or the body) and the creator (or the Atma) with the eye of Self-knowledge, and know the technique (by using any one of the five paths---Selfless service, Knowledge, Devotion, Meditation, and Surrender) of liberation of the living entity (Jeev) from the trap of divine illusory energy (Maya). (13.34)


Thursday, March 6, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 12 भक्तियोग

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥
मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए  जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं॥2॥
 I consider the best yogis to be those ever steadfast devotees (Bhaktas) who worship with supreme faith by fixing their mind on Me as their personal God.  (12.02)

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्‌ ॥
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥
 परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं॥3-4॥
 They also attain Me who worship the unchangeable, the inexplicable, the invisible, the omnipresent, the inconceivable, the unchanging, and the immovable Eternal Being (Brahm); restraining all the senses, even minded under all circumstances, and engaged in the welfare of all creatures. (12.03-04)

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्‌ । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥
उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है॥5॥
Self-realization is more difficult for those who fix their mind on the impersonal, unmanifest, Eternal Being (Brahm); because, comprehension of the unmanifest by embodied beings is attained with difficulty. (12.05)

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥
परन्तु जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं। (इस श्लोक का विशेष भाव जानने के लिए गीता अध्याय 11 श्लोक 55 देखना चाहिए)॥6॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्‌ । भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌ ॥
 हे अर्जुन! उन मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ॥7॥
But for those who worship Me with unswerving devotion as their personal God, offer all actions to Me, intent on Me as the Supreme, and meditate on Me; I swiftly become their savior --- from the world that is the ocean of death and transmigration --- whose thoughts are set on My personal form, O Arjun. (12.06-07)
The four paths to God
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥
 मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा, इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है॥8॥
Therefore, 1 focus your mind on Me, and let your intellect dwell upon Me alone (through meditation and contemplation). Thereafter, you shall certainly attain Me. (12.08)


अथ चित्तं समाधातुं न शक्रोषि मयि स्थिरम्‌ । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥
यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिए समर्थ नहीं है, तो हे अर्जुन! अभ्यासरूप (भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन तथा श्वास द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादि चेष्टाएँ भगवत्प्राप्ति के लिए बारंबार करने का नाम 'अभ्यास' है) योग द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर॥9॥
If you are unable to focus your mind steadily on Me, then long to attain Me, O Arjun, 2 by practice of (any other) spiritual discipline (Saadhanaa) that suits you. (12.09)


अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥
यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायण  हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा॥10॥
If you are unable even to do any spiritual discipline (Saadhanaa), then be intent on performing your duty for Me. You shall attain perfection just 3 by working for Me (as an instrument, just to serve and please Me, without selfish motives).  (12.10)

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः । सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्‌ ॥
यदि मेरी प्राप्ति रूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है, तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग  कर॥11॥
If you are unable to work for Me, then 4 just surrender unto My will and renounce (the attachment to, and the anxiety for) the fruits of all work with subdued mind (by learning to accept all results, as God's grace (Prasaad)) with calmness. (12.11)


श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते । ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्‌ ॥
मर्म को न जानकर किए हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है,
ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और
 ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है॥12॥
(केवल भगवदर्थ कर्म करने वाले पुरुष का भगवान में प्रेम और श्रद्धा तथा भगवान का चिन्तन भी बना रहता है, इसलिए ध्यान से 'कर्मफल का त्याग' श्रेष्ठ कहा है)
The knowledge of scriptures is better than mere ritualistic practice;
meditation is better than scriptural knowledge;
 Tyaag, or renunciation of (the selfish attachment to) the fruits of work is better than meditation;
peace immediately follows Tyaag.  (12.12)

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च । निर्ममो निरहङ्‍कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥
संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
 जो पुरुष सब भूतों में द्वेष भाव से रहित,
स्वार्थ रहित सबका प्रेमी और
हेतु रहित दयालु है तथा ममता से रहित,
अहंकार से रहित,
 सुख-दुःखों की प्राप्ति में सम और
क्षमावान है अर्थात अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला है तथा
जो योगी निरन्तर संतुष्ट है,
मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किए हुए है और
मुझमें दृढ़ निश्चय वाला है- वह मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है॥13-14॥
One who does not hate any creature, who is friendly and compassionate, free from the notion of "I" and "my", even-minded in pain and pleasure, forgiving; and the yogi who is ever content, who has subdued the mind, whose resolve is firm, whose mind and intellect are engaged in dwelling upon Me, who is devoted to Me, is dear to Me. (12.13-14)

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥
 जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और
जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता तथा
जो हर्ष, अमर्ष (दूसरे की उन्नति को देखकर संताप होने का नाम 'अमर्ष' है),
भय और उद्वेगादि से रहित है वह भक्त मुझको प्रिय है॥15॥
The one by whom others are not agitated and who is not agitated by others, who is free from joy, envy, fear, and anxiety, is also dear to Me. (12.15)

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः। सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
  जो पुरुष आकांक्षा से रहित,
बाहर-भीतर से शुद्ध  चतुर,
पक्षपात से रहित और
 दुःखों से छूटा हुआ है- वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है॥16॥
One who is desireless, pure, wise, impartial, and free from anxiety; who has renounced the doership in all undertakings; such a devotee is dear to Me. (12.16)


यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्‍क्षति। शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥
 जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है- वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है॥17॥
One who neither rejoices nor grieves, neither likes nor dislikes, who has renounced both the good and the evil, and is full of devotion; is dear to Me. (12.17)

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः। शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्‍गविवर्जितः॥
 जो शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सर्दी, गर्मी और सुख-दुःखादि द्वंद्वों में सम है और आसक्ति से रहित है॥18॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्‌। अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः॥
 जो निंदा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है- वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान पुरुष मुझको प्रिय है॥19॥
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते। श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥
 परन्तु जो श्रद्धायुक्त (वेद, शास्त्र, महात्मा और गुरुजनों के तथा परमेश्वर के वचनों में प्रत्यक्ष के सदृश विश्वास का नाम 'श्रद्धा' है) पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेमभाव से सेवन करते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं॥20॥

The one who remains the same towards friend or foe, in honor or disgrace, in heat or cold, in pleasure or pain; who is free from attachment; who is indifferent to censure or praise, quiet, content with whatever one has, unattached to a place (a country, or a house), calm, and full of devotion ---that person is dear to Me. (12.18-19)
But those faithful devotees are very dear to Me who set Me as their supreme goal and follow (or just sincerely try to develop) the above mentioned nectar of moral values. (12.20)

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 11 विश्वरूपदर्शनयोग

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः । ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥
मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। इसलिए जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात तेरे युद्ध न करने पर भी इन सबका नाश हो जाएगा॥32॥
The Supreme Lord said: I am death, the mighty destroyer of the world. I have come here to destroy all these people. Even without your participation in the war, all the warriors standing arrayed in the opposing armies shall cease to exist. (11.32)

निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्‌ ॥
You are only My instrument O Arjun.
तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा॥33॥
We are only a divine instrument 
तस्मात्त्वमुक्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रू:
अतएव तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीत
Therefore, you get up and attain glory. Conquer your enemies
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्‌ गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्‌ ॥
हे महात्मन्‌! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बड़े आपके लिए वे कैसे नमस्कार न करें क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत्‌, असत्‌ और उनसे परे अक्षर अर्थात सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वह आप ही हैं॥37॥
O great soul --- bow to You, the original creator who is even greater than Brahmaa, the creator of material worlds? O infinite Lord, O God of all celestial rulers (Devas), O abode of the universe, You are both Sat (Eternal) and Asat (Temporal), and the Supreme Being (ParBrahm) that is beyond both Sat and Asat. (11.37)
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌ । वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप । ।
आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इन जगत के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप! आपसे यह सब जगत व्याप्त अर्थात परिपूर्ण हैं॥38॥

You are the primal God, the most ancient Person. You are the ultimate resort of all the universe. You are the knower, the object of knowledge, and the supreme abode. The entire universe is pervaded by You, O Lord of the infinite form. (11.38)
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्‍क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
 आप वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं। 
You are the controller of death, the fire, the wind, the water god, the moon god, and Brahmaa, the creator, as well as the father of Brahmaa.
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।
शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्ट्वानसि मां यथा ॥
 जिस प्रकार तुमने मुझको देखा है- इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से ही देखा जा सकता हूँ॥53॥

This (four-armed) form of Mine that you have just seen cannot be seen even by study of the Vedas, or by austerity, or by acts of charity, or by the performance of rituals. (11.53)

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥
 परन्तु हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्ति (अनन्यभक्ति का भाव अगले श्लोक में विस्तारपूर्वक कहा है।) के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज रूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिए, तत्व से जानने के लिए तथा प्रवेश करने के लिए अर्थात एकीभाव से प्राप्त होने के लिए भी शक्य हूँ॥54॥
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्‍गवर्जितः ।निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥
 हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है (सर्वत्र भगवद्बुद्धि हो जाने से उस पुरुष का अति अपराध करने वाले में भी वैरभाव नहीं होता है, फिर औरों में तो कहना ही क्या है), वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है॥55॥
However, through single-minded devotion alone, I can be seen in this form, can be known in essence, and also can be reached, O Arjun. (11.54) One who does all works for Me, and to whom I am the supreme goal; who is my devotee, who has no attachment, and is free from enmity towards any being --- attains Me, O Arjun.  (11.55)




Wednesday, January 29, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 6 आत्मसंयमयोग

               आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
          मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है॥5॥
          The mind alone is one’s friend as well as one’s enemy

            बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्‌ ॥
 जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिए वह आप ही शत्रु के सदृश शत्रुता में बर्तता है॥6॥
   The mind is the friend of those who have control over it, and the mind acts like an enemy for those who do not control it. (6.06)

      जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥
  सरदी-गरमी और सुख-दुःखादि में तथा मान और अपमान में जिसके अन्तःकरण की वृत्तियाँ भलीभाँति शांत हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मावाले पुरुष के ज्ञान में सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक्‌ प्रकार से स्थित है अर्थात उसके ज्ञान में परमात्मा के सिवा अन्य कुछ है ही नहीं॥7॥
     One who has control over the lower self --- the mind and senses --- is tranquil in heat and cold, in pleasure and pain, and in honor and dishonor, and remains ever steadfast with the supreme Self. (6.07)

         युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः । शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥
  वश में किए हुए मनवाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरंतर मुझ परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ मुझमें रहने वाली परमानन्द की पराकाष्ठारूप शान्ति को प्राप्त होता है॥15॥

         Thus, by always practicing to keep the mind fixed on Me, the yogi whose mind is subdued attains peace of BrahmNirvan and comes to Me. (6.15)

    असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌ । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
  श्री भगवान बोले- हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। परन्तु हे कुंतीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास  और वैराग्य से वश में होता है॥35॥
Undoubtedly, O Arjun, the mind is restless and difficult to restrain, but it is subdued by constant vigorous spiritual practice with perseverance, and detachment (6.35)

     पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥
  श्री भगवान बोले- हे पार्थ! उस पुरुष (जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है)  का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में ही क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धार के लिए अर्थात भगवत्प्राप्ति के लिए कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता॥40॥
      The Supreme Lord said: There is no destruction, O Arjun, for a yogi either here or hereafter. A transcendentalist is never put to grief, My dear friend. (6.40) 

    प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥
 योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को अर्थात स्वर्गादि उत्तम लोकों को प्राप्त होकर उनमें बहुत वर्षों तक निवास करके फिर शुद्ध आचरण वाले श्रीमान पुरुषों के घर में जन्म लेता है॥41॥
    अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्‌ । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्‌ ॥
  अथवा वैराग्यवान पुरुष उन लोकों में न जाकर ज्ञानवान योगियों के ही कुल में जन्म लेता है, परन्तु इस प्रकार का जो यह जन्म है, सो संसार में निःसंदेह अत्यन्त दुर्लभ है॥42॥
      The unsuccessful yogi is reborn in the house of the pious and prosperous after attaining heaven and living there for many years, or such a yogi is born in a family of enlightened yogis. A birth like this is very difficult, indeed, to obtain in this world. (6.41-42)

  तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्‌ । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥
 वहाँ उस पहले शरीर में संग्रह किए हुए बुद्धि-संयोग को अर्थात समबुद्धिरूप योग के संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन! उसके प्रभाव से वह फिर परमात्मा की प्राप्तिरूप सिद्धि के लिए पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करता है॥43॥
  पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥
 वह (यहाँ 'वह' शब्द से  शुद्ध आचरण वाले श्रीमानों के घर में जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट पुरुष समझना चाहिए।) श्रीमानों के घर में जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहले के अभ्यास से ही निःसंदेह भगवान की ओर आकर्षित किया जाता है तथा समबुद्धि रूप योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मों के फल को उल्लंघन कर जाता है॥44॥
 There he or she regains the knowledge acquired in the previous life, and strives again to achieve perfection, O Arjun. (6.43) The unsuccessful yogi is instinctively carried towards the Eternal Being (Brahm) by virtue of the impressions (Samskaar) of yogic practices of previous lives. Even the inquirer of yog --- the union with God --- surpasses those who perform Vedic rituals. (6.44)
    प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यात परां गतिम्‌ ॥
 परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी तो पिछले अनेक जन्मों के संस्कारबल से इसी जन्म में संसिद्ध होकर सम्पूर्ण पापों से रहित हो फिर तत्काल ही परमगति को प्राप्त हो जाता है॥45॥
The yogi who diligently strives, becomes completely free from all sins (or imperfections) in this birth only after gradually perfecting through many previous incarnations, and reaches the Supreme Abode. (6.45)

    तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥
 योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है। इससे हे अर्जुन! तू योगी हो॥46॥
The yogi is superior to the ascetics. The yogi is superior to the (Vedic) scholars. The yogi is superior to the ritualists. Therefore, O Arjun, be a yogi. (6.46)

Tuesday, January 28, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 5 कर्मसंन्यासयोग

        कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते

    कर्म संन्यास से कर्मयोग साधन में सुगम होने से श्रेष्ठ है

  The Supreme Lord said: The path of Self-knowledge (Karm-samnyaas) and the path of selfless service (KarmaYog, Seva) both lead to the supreme goal. But, of the two, KarmaYog is approachable hence superior to Karm-samnyaas. (5.02)

जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी पुरुष सुखपूर्वक संसार बंधन से मुक्त हो जाता है

अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है

         ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
          तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्‌ ॥

  परन्तु जिनका वह अज्ञान परमात्मा के तत्व ज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस सच्चिदानन्दघन परमात्मा को प्रकाशित कर देता है॥16॥Transcendental knowledge destroys the ignorance of the Self and reveals the Supreme just as the sun reveals the beauty of objects of the world. (5.16)
    शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्‌ ।
    कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥

 जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है॥23॥One who is able to withstand the impulse of lust and anger before death is a yogi, and a happy person. (5.23)
       विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥
      जो  इच्छा, भय और क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है
    Who desire to be free from fear and anger, he is always free