Showing posts with label गीता-सार. Show all posts
Showing posts with label गीता-सार. Show all posts

Sunday, March 16, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 18 मोक्षसंन्यासयोग

   यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्‌ । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्‌ ॥
 यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याग करने के योग्य नहीं है, बल्कि वह तो अवश्य कर्तव्य है, क्योंकि यज्ञ, दान और तप -ये तीनों ही कर्म बुद्धिमान पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं॥5॥
(वह मनुष्य बुद्धिमान है, जो फल और आसक्ति को त्याग कर केवल भगवदर्थ कर्म करता है।)
Definition of renunciation and sacrifice
Acts of service, charity, and austerity should not be abandoned, but should be performed because service, charity, and austerity are the purifiers of the wise. (18.05)

 एतान्यपि तु कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानीति में पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्‌ ॥
 इसलिए हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिए, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है॥6॥
Even these obligatory works should be performed without attachment to the fruits. This is My definite supreme advice, O Arjun. (18.06)

   नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते । मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥
 (निषिद्ध और काम्य कर्मों का तो स्वरूप से त्याग करना उचित ही है)
परन्तु नियत कर्म का  स्वरूप से त्याग करना उचित नहीं है। इसलिए मोह के कारण उसका त्याग कर देना तामस त्याग कहा गया है॥7॥
Giving up one's duty is not proper. The abandonment of obligatory work is due to delusion and is declared to be in the mode of ignorance. (18.07)

    दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्‌ । स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्‌ ॥
  जो कुछ कर्म है वह सब दुःखरूप ही है- ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेश के भय से कर्तव्य-कर्मों का त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को किसी प्रकार भी नहीं पाता॥8॥
One who abandons duty merely because it is difficult or because of fear of bodily affliction, does not get the benefits of sacrifice by performing such a sacrifice in the mode of passion. (18.08)
for example sonia gandhi's 'tyag' after 2004 election

    कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेअर्जुन । सङ्‍गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥
  हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है- इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है- वही सात्त्विक त्याग माना गया है॥9॥
 Obligatory work performed as duty, renouncing selfish attachment to the fruit, is alone to be regarded as sacrifice in the mode of goodness, O Arjun. (18.09)

    न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते । त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥
 जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है॥10॥
One who neither hates a disagreeable work, nor is attached to an agreeable work, is considered a renunciant (Tyaagi), imbued with the mode of goodness, intelligent, and free from all doubts about the Supreme Being. (18.10)

   न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥
 क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्य द्वारा सम्पूर्णता से सब कर्मों का त्याग किया जाना शक्य नहीं है, इसलिए जो कर्मफल त्यागी है, वही त्यागी है- यह कहा जाता है॥11॥
Human beings cannot completely abstain from work. Therefore, one who completely renounces selfish attachment to the fruits of all work is considered a renunciant. (18.11)

  अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्‌ । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्‌ ॥
 कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा, बुरा और मिला हुआ- ऐसे तीन प्रकार का फल मरने के पश्चात अवश्य होता है, किन्तु कर्मफल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल किसी काल में भी नहीं होता॥12॥
The threefold fruit of works --- desirable, undesirable, and mixed --- accrues after death to the one who is not a Tyaagi (Renunciant), but never to a Tyaagi. (18.12)

       पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे । साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्‌ ॥
   हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के ये पाँच हेतु कर्मों का अंत करने के लिए उपाय बतलाने वाले सांख्य-शास्त्र में कहे गए हैं, उनको तू मुझसे भलीभाँति जान॥13॥
     अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्‌ । विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्‌ ॥
  इस विषय में अर्थात कर्मों की सिद्धि में
अधिष्ठान (जिसके आश्रय कर्म किए जाएँ, उसका नाम अधिष्ठान है) और
कर्ता तथा
भिन्न-भिन्न प्रकार के करण (जिन-जिन इंद्रियादिकों और साधनों द्वारा कर्म किए जाते हैं, उनका नाम करण है) एवं
नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और
वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव (पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों के संस्कारों का नाम दैव है) है॥14॥

   शरीरवाङ्‍मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥
  मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है- उसके ये पाँचों कारण हैं॥15॥
Five causes of an actionLearn from Me, O Arjun, the five causes, as described in the Saamkhya doctrine, for the accomplishment of all actions. They are: The physical body, the seat of Karm; the modes (Gunas) of material Nature, the doer; the eleven organs of perception and action, the instruments; various Praanas (bioimpulses, life forces); and the fifth is presiding deities (of the eleven organs) fate. (18.13-14)
 Fate is only 1 of 5 causative factor of an action - karm

 These are the five causes of whatever action, whether right or wrong, one performs by thought, word and deed. (18.15)


       तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥
 परन्तु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि (सत्संग और शास्त्र के अभ्यास से तथा भगवदर्थ कर्म और उपासना के करने से मनुष्य की बुद्धि शुद्ध होती है, इसलिए जो उपर्युक्त साधनों से रहित है, उसकी बुद्धि अशुद्ध है, ऐसा समझना चाहिए।) होने के कारण उस विषय में यानी कर्मों के होने में केवल शुद्ध स्वरूप आत्मा को कर्ता समझता है, वह मलीन बुद्धि वाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता॥16॥
Therefore, the ignorant, who consider one’s body or the soul as the sole agent, do not understand due to imperfect knowledge. (18.16) 

   यस्य नाहङ्‍कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥

जिस पुरुष के अन्तःकरण में 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और कर्मों में लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मरता है और न पाप से बँधता है।
(
जैसे अग्नि, वायु और जल द्वारा प्रारब्धवश किसी प्राणी की हिंसा होती देखने में आए तो भी वह वास्तव में हिंसा नहीं है, वैसे ही जिस पुरुष का देह में अभिमान नहीं है और स्वार्थरहित केवल संसार के हित के लिए ही जिसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ होती हैं, उस पुरुष के शरीर और इन्द्रियों द्वारा यदि किसी प्राणी की हिंसा होती हुई लोकदृष्टि में देखी जाए, तो भी वह वास्तव में हिंसा नहीं है क्योंकि आसक्ति, स्वार्थ और अहंकार के न होने से किसी प्राणी की हिंसा हो ही नहीं सकती तथा बिना कर्तृत्वाभिमान के किया हुआ कर्म वास्तव में अकर्म ही है, इसलिए वह पुरुष 'पाप से नहीं बँधता'।)॥17॥

One who is free from the notion of doership and whose intellect is not polluted by the desire to reap the fruit --- even after slaying all these people --- neither slays nor is bound by the act of killing. (18.17)
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना motive impelling to ritual acts। करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥
 ज्ञाता (जानने वाले का नाम 'ज्ञाता' है।), 
ज्ञान (जिसके द्वारा जाना जाए, उसका नाम 'ज्ञान' है। ) और 
ज्ञेय (जानने में आने वाली वस्तु का नाम 'ज्ञेय' है।)- ये तीनों प्रकार की कर्म-प्रेरणा हैं और 
कर्ता (कर्म करने वाले का नाम 'कर्ता' है।), 
करण (जिन साधनों से कर्म किया जाए, उनका नाम 'करण' है।) तथा 
क्रिया (करने का नाम 'क्रिया' है।)- ये तीनों प्रकार का कर्म-संग्रह है॥18॥
The subject, the object, and the knowledge of the object are the threefold driving force (or impetus) to an action. The eleven organs (of perception and action), the act, and the agent or the modes (Gunas) of material Nature are the three components of action. (18.18)

   सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥
  जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब भूतों में एक अविनाशी परमात्मभाव को विभागरहित समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक जान॥20॥
The knowledge by which one sees a single immutable Reality in all beings as undivided in the divided, such knowledge is in the mode of goodness.  (18.20)

   पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्‌ । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्‌ ॥
किन्तु जो ज्ञान अर्थात जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को तू राजस जान॥21॥
The knowledge by which one sees different realities of various types among all beings as separate from one another; such knowledge is in the mode of passion. (18.21)

  यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्‌। अतत्त्वार्थवदल्पंच तत्तामसमुदाहृतम्‌॥
  परन्तु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्त्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है- वह तामस कहा गया है॥22॥
The irrational, baseless, and worthless knowledge by which one clings to one single effect (such as the body) as if it is everything, such knowledge is declared to be in the mode of darkness of ignorance (18.22)

   नियतं सङ्‍गरहितमरागद्वेषतः कृतम। अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥
 जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष के किया गया हो- वह सात्त्विक कहा जाता है॥23॥
Obligatory duty performed without likes and dislikes and without selfish motives and attachment to enjoy the fruit, is said to be in the mode of goodness. (18.23)

  यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्‍कारेण वा पुनः। क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्‌॥
 परन्तु जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त होता है तथा भोगों को चाहने वाले पुरुष द्वारा या अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है॥24॥
Action performed with ego, with selfish motives, and with too much effort, is in the mode of passion. (18.24)
   
   अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्‌ । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥
 जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है॥25॥
Action that is undertaken because of delusion, disregarding consequences, loss, injury to others, as well as one’s own ability, is said to be in the mode of ignorance. (18.25)

   मुक्तसङ्‍गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥
 जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष -शोकादि विकारों से रहित है- वह सात्त्विक कहा जाता है॥26॥
The agent who is free from attachment, is non-egotistic, endowed with resolve and enthusiasm, and unperturbed in success or failure is called good. (18.26)

  रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः। हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥
  जो कर्ता आसक्ति से युक्त कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है वह राजस कहा गया है॥27॥
The agent who is impassioned, who desires the fruits of work, who is greedy, violent, impure, and gets affected by joy and sorrow; is called passionate. (18.27)

    आयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥
 जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला तथा शोक करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री
(दीर्घसूत्री उसको कहा जाता है कि जो थोड़े काल में होने लायक साधारण कार्य को भी फिर कर लेंगे, ऐसी आशा से बहुत काल तक नहीं पूरा करता। )
है वह तामस कहा जाता है॥28॥
The agent who is undisciplined, vulgar, stubborn, wicked, malicious, lazy, depressed, and procrastinating is called ignorant. (18.28)

   प्रवत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। बन्धं मोक्षं च या वेति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
  हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग
(गृहस्थ में रहते हुए फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदर्पण बुद्धि से केवल लोकशिक्षा के लिए राजा जनक की भाँति बरतने का नाम 'प्रवृत्तिमार्ग' है।) और निवृत्ति मार्ग को
(देहाभिमान को त्यागकर केवल सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव स्थित हुए श्री शुकदेवजी और सनकादिकों की भाँति संसार से उपराम होकर विचरने का नाम 'निवृत्तिमार्ग' है।), कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ जानती है- वह बुद्धि सात्त्विकी है ॥30॥
O Arjun, that intellect is in the mode of goodness which understands the path of work and the path of renunciation, right and wrong action, fear and fearlessness, bondage and liberation. (18.30)

   यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥
 हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है॥31॥
That intellect is in the mode of passion which cannot distinguish between righteousness (Dharm) and unrighteousness (Adharm), and right and wrong action, O Arjun. (18.31)

  अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥
 हे अर्जुन! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी 'यह धर्म है' ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है॥32॥
That intellect is in the mode of ignorance which, when covered by ignorance, accepts unrighteousness (Adharm) as righteousness (Dharm) and thinks everything to be that which it is not, O Arjun. (18.32)

Three types of resolve, and the four goals of human life
   धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
 हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति
 (भगवद्विषय के सिवाय अन्य सांसारिक विषयों को धारण करना ही व्यभिचार दोष है, उस दोष से जो रहित है वह 'अव्यभिचारिणी धारणा' है।)
से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं
 ( मन, प्राण और इंद्रियों को भगवत्प्राप्ति के लिए भजन, ध्यान और निष्काम कर्मों में लगाने का नाम 'उनकी क्रियाओं को धारण करना' है।)
को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है॥33॥
That resolve is in the mode of goodness by which one manipulates the functions of the mind, Praan (bioimpulses, life forces) and senses for God-realization only, O Arjun. (18.33)

   यया तु धर्मकामार्थान्धत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्‍गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥
 परंतु हे पृथापुत्र अर्जुन! फल की इच्छावाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्ति से धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारण शक्ति राजसी है॥34॥
That resolve is in the mode of passion by which one, craving for the fruits of work, clings to Dharm (Duty), Arth (Wealth), and Kaam (Pleasure) with great attachment. (18.34)

   यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च। न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥
 हे पार्थ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिंता और दु:ख को तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता अर्थात धारण किए रहता है- वह धारण शक्ति तामसी है॥35॥
That resolve is in the mode of ignorance by which a dull person does not give up sleep, fear, grief, despair, and carelessness, O Arjun. (18.35)

    Three types of pleasure
    सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥
    यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्‌। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्‌॥
  हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अंत को प्राप्त हो जाता है, जो ऐसा सुख है, वह आरंभकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत (जैसे खेल में आसक्ति वाले बालक को विद्या का अभ्यास मूढ़ता के कारण प्रथम विष के तुल्य भासता है वैसे ही विषयों में आसक्ति वाले पुरुष को भगवद्भजन, ध्यान, सेवा आदि साधनाओं का अभ्यास मर्म न जानने के कारण प्रथम 'विष के तुल्य प्रतीत होता' है) होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है, इसलिए वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है॥36-37॥
And now hear from Me, O Arjun, about the threefold pleasure. The pleasure that one enjoys from spiritual practice results in cessation of all sorrows. (18.36) 
The pleasure that appears as poison in the beginning, but is like nectar in the end, comes by the grace of Self-knowledge and is in the mode of goodness. (18.37)

   विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्‌। परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्‌॥
 जो सुख विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है, वह पहले- भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य (बल, वीर्य, बुद्धि, धन, उत्साह और परलोक का नाश होने से विषय और इंद्रियों के संयोग से होने वाले सुख को 'परिणाम में विष के तुल्य' कहा है) है इसलिए वह सुख राजस कहा गया है॥38॥
Sensual pleasures that appear as nectars in the beginning, but become poison in the end, are in the mode of passion. (18.38) 

   यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः। निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥
 जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है॥39॥
  Pleasure that confuses a person in the beginning and in the end as a result of sleep, laziness, and carelessness, is in the mode of ignorance. (18.39)

    न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः। सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिःस्यात्त्रिभिर्गुणैः॥
 पृथ्वी में या आकाश में अथवाThere is no being, either on the earth or among the celestial controllers (Devas) in the heaven, who can remain free from these three modes (Gunas) of material Nature (Prakriti). (18.40)  देवताओं में तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो॥40॥
वर्ण धर्मDivision of labor is based on one’s ability

  ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥
 हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं॥41॥
The division of labor into the four categories --- Braahman, Kshatriya, Vaishya, and Shudr --- is also based on the qualities inherent in people’s nature (or the natural propensities, and not necessarily as one’s birth right), O Arjun.  (18.41)

   शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌ ॥
 अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में देखना चाहिए)
रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना- ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं॥42॥
Intellectuals who have serenity, self-control, austerity, purity, patience, honesty, transcendental knowledge, transcendental experience, and belief in God are labeled as Braahmans. (18.42)

   शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌॥
 शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं॥43॥Those having the qualities of heroism, vigor, firmness, dexterity, steadfastness in battle, charity, and administrative skills are called Kshatriyas or protectors. (18.43)

  कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्‌। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्‌॥
  खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार 
(वस्तुओं के खरीदने और बेचने में तौल, नाप और गिनती आदि से कम देना अथवा अधिक लेना एवं वस्तु को बदलकर या एक वस्तु में दूसरी या खराब वस्तु मिलाकर दे देना अथवा अच्छी ले लेना तथा नफा, आढ़त और दलाली ठहराकर उससे अधिक दाम लेना या कम देना तथा झूठ, कपट, चोरी और जबरदस्ती से अथवा अन्य किसी प्रकार से दूसरों के हक को ग्रहण कर लेना इत्यादि दोषों से रहित जो सत्यतापूर्वक पवित्र वस्तुओं का व्यापार है उसका नाम 'सत्य व्यवहार' है।) ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है॥44॥Those who are good at cultivation, cattle rearing, business, trade, and industry are known as Vaishyas. Those who are very good in service and labor type work are classed as Shudras. (18.44)

  सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्‌। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥
अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धूएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं॥48॥
  (प्रकृति के अनुसार शास्त्र विधि से नियत किए हुए वर्णाश्रम के धर्म और सामान्य धर्मरूप स्वाभाविक कर्म हैं उनको ही यहाँ स्वधर्म, सहज कर्म, स्वकर्म, नियत कर्म, स्वभावज कर्म, स्वभावनियत कर्म इत्यादि नामों से कहा है)
   स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
 अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन॥45॥
One can attain the highest perfection by devotion to one’s natural work. Listen to Me how one attains perfection while engaged in one’s natural work. (18.45)

  यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्‌। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥
 जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत्‌ व्याप्त है 
(जैसे बर्फ जल से व्याप्त है, वैसे ही संपूर्ण संसार सच्चिदानंदघन परमात्मा से व्याप्त है), 
उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके 
(जैसे पतिव्रता स्त्री पति को सर्वस्व समझकर पति का चिंतन करती हुई पति के आज्ञानुसार पति के ही लिए मन, वाणी, शरीर से कर्म करती है, वैसे ही परमेश्वर को ही सर्वस्व समझकर परमेश्वर का चिंतन करते हुए परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार मन, वाणी और शरीर से परमेश्वर के ही लिए स्वाभाविक कर्तव्य कर्म का आचरण करना 'कर्म द्वारा परमेश्वर को पूजना' है) 
मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है॥46॥
One attains perfection by worshipping the Supreme Being --- from whom all beings originate, and by whom all this universe is pervaded --- through performance of one’s natural duty for Him.(18.46)
 

  श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌॥
 अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता॥47॥
 One’s inferior natural work is better than superior unnatural work even though well performed. One who does the work ordained by one’s inherent nature (without selfish motives) incurs no sin (or Karmic reaction). (18.47)

   सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्‌। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥
  अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म
 (प्रकृति के अनुसार शास्त्र विधि से नियत किए हुए वर्णाश्रम के धर्म और सामान्य धर्मरूप स्वाभाविक कर्म हैं उनको ही यहाँ स्वधर्म, सहज कर्म, स्वकर्म, नियत कर्म, स्वभावज कर्म, स्वभावनियत कर्म इत्यादि नामों से कहा है)
को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धूएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं॥48॥

   One’s natural work, even though defective, should not be abandoned, because all undertakings are enveloped by defects as fire is covered by smoke, O Arjun. (18.48)

 this is pretty lose shlocks & lose words -  स्वाभाविक कर्तव्य कर्म , स्वभावनियतं कर्म, स्वधर्मरूप कर्म, स्वधर्म,  परधर्म   सहजं कर्म,  स्वकर्म easily can wrongly interpreted

 असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥
 सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अंतःकरण वाला पुरुष सांख्ययोग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है॥49॥
The person whose mind is always free from selfish attachment, who has subdued the mind and senses, and who is free from desires, attains the supreme perfection of freedom from the bondage of Karm by renouncing selfish attachment to the fruits of work. (18.49)

ज्ञान योग की परानिष्ठा
  बुद्ध्‌या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च। शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥
 विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस। ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥
 अहङकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्‌। विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
 विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हलका, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला,
 शब्दादि विषयों का त्याग करके एकांत और शुद्ध देश का सेवन करने वाला,
 सात्त्विक धारण शक्ति के  द्वारा अंतःकरण और इंद्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला,
 राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके भलीभाँति दृढ़ वैराग्य का आश्रय लेने वाला तथा 
अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरंतर ध्यान योग के परायण रहने वाला, 
ममतारहित और 
शांतियुक्त पुरुष सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में अभिन्नभाव से स्थित होने का पात्र होता है॥51-53॥
Endowed with purified intellect, 
subduing the mind with firm resolve,
 turning away from sound and other objects of the senses, 
giving up likes and dislikes; living in solitude; eating lightly;
 controlling the mind, speech, and organs of action; 
ever absorbed in yog of meditation;
 taking refuge in detachment; and 
relinquishing egotism, violence, pride, lust, anger, and proprietorship --- 

one becomes peaceful, free from the notion of "I” and “my", and fit for attaining oneness with the Supreme Being (ParBrahm). (18.51-53)

  ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्‌॥
 फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसी के लिए शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव वाला योगी मेरी पराभक्ति को प्राप्त हो जाता है॥54॥
( जो तत्त्व ज्ञान की पराकाष्ठा है तथा जिसको प्राप्त होकर और कुछ जानना बाकी नहीं रहता वही यहाँ पराभक्ति, ज्ञान की परानिष्ठा, परम नैष्कर्म्यसिद्धि और परमसिद्धि इत्यादि नामों से कही गई है) 
  भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्‌॥
 उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्व से जान लेता है तथा उस भक्ति से मुझको तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है॥55॥
 Absorbed in the Supreme Being (ParBrahm), the serene one neither grieves nor desires. Becoming impartial to all beings, one obtains My Paraa-Bhakti, the highest devotional love. (18.54) 
By devotion one truly understands what and who I am in essence. Having known Me in essence, one immediately merges with Me.  (18.55)

  सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्‌॥
 मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो संपूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है॥56॥
A KarmaYogi devotee attains Moksh, the eternal immutable abode, by My grace --- even while doing all duties --- just by taking refuge in Me (by surrendering all action to Me with loving devotion). (18.56)

  स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्‌ ॥
 हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा॥60॥
O Arjun, you are controlled by your own nature-born Karmic impressions (Samskaar). Therefore, you shall do --- even against your will --- what you do not wish to do out of delusion. (18.60)
  स्वभाव  = your own nature-born Karmic impressions (Samskaar)
 
   ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥
  हे अर्जुन! शरीर रूप यंत्र में आरूढ़ हुए संपूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है॥61॥
The Supreme Lord, abiding as the controller (Ishvar) in the causal heart (or the inner psyche) of all beings, O Arjun, causes them to act (or work out their Karm) like a puppet (of Karm) mounted on a machine. (18.61)

  तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌॥
 हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परमधाम को प्राप्त होगा॥62॥
(लज्जा, भय, मान, बड़ाई और आसक्ति को त्यागकर एवं शरीर और संसार में अहंता, ममता से रहित होकर एक परमात्मा को ही परम आश्रय, परम गति और सर्वस्व समझना तथा अनन्य भाव से अतिशय श्रद्धा, भक्ति और प्रेमपूर्वक निरंतर भगवान के नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूप का चिंतन करते रहना एवं भगवान का भजन, स्मरण करते हुए ही उनके आज्ञा अनुसार कर्तव्य कर्मों का निःस्वार्थ भाव से केवल परमेश्वर के लिए आचरण करना यह 'सब प्रकार से परमात्मा के ही शरण' होना है)
 Seek refuge in the Supreme Lord (Krishn or Ishvar) alone with loving devotion, O Arjun. By His grace you shall attain supreme peace and the Eternal Abode (ParamDhaam). (18.62)

   इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्‍गुह्यतरं मया । विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥
  इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया। अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञान को पूर्णतया भलीभाँति विचार कर, जैसे चाहता है वैसे ही कर॥63॥
Thus, I have explained the knowledge that is more secret than the secret. After fully reflecting on this, do as you wish. (18.63)

Krishna given us free will and respect it all the time  may be that why there is so much suffering in world.


   मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥
हे अर्जुन! तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है॥65॥
 Fix your mind on Me, be devoted to Me, offer service to Me, bow down to Me, and you shall certainly reach Me. I promise you because you are My very dear friend. (18.65)

   सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण ( में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर॥66॥
Setting aside all meritorious deeds (Dharm), just surrender completely to My will (with firm faith and loving contemplation). I shall liberate you from all sins (or the bonds of Karm). Do not grieve. (18.66)

गीता सार

Wednesday, March 12, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 17 श्रद्धात्रयविभागयोग

    त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु॥
  श्री भगवान्‌ बोले- मनुष्यों की वह शास्त्रीय संस्कारों से रहित केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी- ऐसे तीनों प्रकार की ही होती है। उसको तू मुझसे सुन॥2॥
 (अनन्त जन्मों में किए हुए कर्मों के सञ्चित संस्कार से उत्पन्न हुई श्रद्धा ''स्वभावजा'' श्रद्धा कही जाती है।)
   The natural faith of embodied beings is of three kinds: Goodness, passion, and ignorance (Saattvik, Raajasik, and Taamasik). Now hear about these from Me. (17.02)

     सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥
   हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है॥3॥
O Arjun, the faith of each is in accordance with one’s own natural disposition (governed by Karmic impressions). One is known by one’s faith. One can become whatever one wants to be (if one constantly contemplates on the object of desire with faith). (17.03)

  यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये जयन्ते तामसा जनाः॥
 सात्त्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं॥4॥
Persons in the mode of goodness worship celestial controllers (Devas); those in the mode of passion worship supernatural rulers and demons; and those in the mode of ignorance worship ghosts and spirits. (17.04)
like some ignorant muslims-sufis-hindus worships grave, sai baba .....

    अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः। दम्भाहङ्‍कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥
जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं॥5॥
      कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्‌यासुरनिश्चयान्‌॥
  जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को और अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं (शास्त्र से विरुद्ध उपवासादि घोर आचरणों द्वारा शरीर को सुखाना एवं भगवान्‌ के अंशस्वरूप जीवात्मा को क्लेश देना, भूत समुदाय को और अन्तर्यामी परमात्मा को ''कृश करना'' है।), उन अज्ञानियों को तू आसुर स्वभाव वाले जान॥6॥
Ignorant persons of demonic nature are those who practice severe austerities without following the prescription of the scriptures, who are full of hypocrisy and egotism, who are impelled by the force of desire and attachment, and who senselessly torture the elements in their body and also Me who dwells within the body. (17.05-06)
here Krishna emphasized on authority of scripture 

    आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
  भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है।
Three types of food
 The food preferred by all of us is also of three types.

   आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः। रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥
 आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय- ऐसे आहार अर्थात्‌ भोजन करने के पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं॥8॥
(जिस भोजन का सार शरीर में बहुत काल तक रहता है, उसको स्थिर रहने वाला कहते हैं।)
The foods that promote longevity, virtue, strength, health, happiness, and joy are juicy, smooth, substantial, and nutritious. Such foods are liked by persons in the mode of goodness. (17.08)

    कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः। आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥
 कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार अर्थात्‌ भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं॥9॥
People in the mode of passion like foods that are very bitter, sour, salty, hot, pungent, dry, and burning; and cause pain, grief, and disease. (17.09)

    यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्‌। उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्‌॥
  जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है॥10॥
People in the mode of ignorance like foods that are stale, tasteless, putrid, rotten, refuse, and impure (such as meat and alcohol). (17.10)

    देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्‌। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥
  देवता, ब्राह्मण, गुरु (यहाँ 'गुरु' शब्द से माता, पिता, आचार्य और वृद्ध एवं अपने से जो किसी प्रकार भी बड़े हों, उन सबको समझना चाहिए।) और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा- यह शरीर- सम्बन्धी तप कहा जाता है॥14॥
   Austerity of thought, word, and deed
   मनसा वाचा कर्मणा 

 The worship of celestial controllers (Devas), the priest, the guru, and the wise; purity, honesty, celibacy, and nonviolence --- these are said to be austerity of deed. (17.14)

     अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्‌। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्‍मयं तप उच्यते॥
  जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है (मन और इन्द्रियों द्वारा जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा ही कहने का नाम 'यथार्थ भाषण' है।) तथा जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है- वही वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है॥15॥
Speech that is non-offensive, truthful, pleasant, beneficial, and is used for the regular study of scriptures is called the austerity of word. (17.15)

   मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥
  मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण के भावों की भलीभाँति पवित्रता, इस प्रकार यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है॥16॥
Serenity of mind, gentleness, calmness, self-control, and purity of thought --- these are called austerity of thought. (17.16)

    श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः। अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥
 फल को न चाहने वाले योगी पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किए हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप को सात्त्विक कहते हैं॥17॥
The above mentioned threefold austerity (of thought, word, and deed), practiced by yogis with supreme faith, without a desire for the fruit, is said to be in the mode of goodness. (17.17)

   सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्‌। क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्‌॥
 जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए तथा अन्य किसी स्वार्थ के लिए भी स्वभाव से या पाखण्ड से किया जाता है, वह अनिश्चित ('अनिश्चित फलवाला' उसको कहते हैं कि जिसका फल होने न होने में शंका हो।) एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है॥18॥
Austerity that is performed for gaining respect, honor, reverence, and for the sake of show, yielding an uncertain and temporary result, is said to be in the mode of passion. (17.18)

    मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्‌॥
  जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है- वह तप तामस कहा गया है॥19॥
Austerity performed with foolish stubbornness or with self-torture or for harming others, is said to be in the mode of ignorance. (17.19)
  like muslims do in muhrram 

   दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्‌॥
दान देना ही कर्तव्य है- ऐसे भाव से जो दान देश तथा काल
(जिस देश-काल में जिस वस्तु का अभाव हो, वही देश-काल, उस वस्तु द्वारा प्राणियों की सेवा करने के लिए योग्य समझा जाता है।)
और पात्र के
(भूखे, अनाथ, दुःखी, रोगी और असमर्थ तथा भिक्षुक आदि तो अन्न, वस्त्र और ओषधि एवं जिस वस्तु का जिसके पास अभाव हो, उस वस्तु द्वारा सेवा करने के लिए योग्य पात्र समझे जाते हैं और श्रेष्ठ आचरणों वाले विद्वान्‌ ब्राह्मणजन धनादि सब प्रकार के पदार्थों द्वारा सेवा करने के लिए योग्य पात्र समझे जाते हैं।)
प्राप्त होने पर उपकार न करने वाले के प्रति दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है॥20॥
   Charity that is given at the right place and time as a matter of duty to a deserving candidate who does nothing in return, is considered to be in the mode of goodness. (17.20)

    यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्‌॥
  किन्तु जो दान क्लेशपूर्वक
 (जैसे प्रायः वर्तमान समय के चन्दे-चिट्ठे आदि में धन दिया जाता है।)
तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल को दृष्टि में
(अर्थात्‌ मान बड़ाई, प्रतिष्ठा और स्वर्गादि की प्राप्ति के लिए अथवा रोगादि की निवृत्ति के लिए।)
रखकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है॥21॥
Charity that is given unwillingly, or to get something in return, or to gain for some fruit, is said to be in the mode of passion. (17.21)

  अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते। असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥
 जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश-काल में और कुपात्र के प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है॥22॥
  Charity that is given at a wrong place and time to unworthy persons, or without paying respect to the receiver or with ridicule, is said to be in the mode of ignorance. (17.22)

     ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः। ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥
 ॐ, तत्‌, सत्‌-ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानन्दघन ब्रह्म का नाम कहा है, उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादि रचे गए॥23॥
"OM TAT SAT" is said to be the threefold name of the Eternal Being (Brahm). Persons with good (Braahmanic) qualities, the Vedas, and the selfless service (Seva, Yajn) were created by and from Brahm in the ancient time. (17.23

    तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः। प्रवर्तन्ते विधानोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम्‌॥
 इसलिए वेद-मन्त्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्र विधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा 'ॐ' इस परमात्मा के नाम को उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं॥24॥
  Therefore, acts of sacrifice, charity, and austerity prescribed in the scriptures are always commenced by uttering "OM" by the knowers of the Supreme Being (ParBrahm). (17.24)

   अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्‌। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥
 हे अर्जुन! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है- वह समस्त 'असत्‌'- इस प्रकार कहा जाता है, इसलिए वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के बाद ही॥28॥
Whatever is done without faith --- whether it is sacrifice, charity, austerity, or any other act --- is called "ASAT". It has no value here or hereafter, O Arjun. (17.28)




Tuesday, March 11, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 16 दैवासुरसम्पद्विभागयोग

     अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्‌॥
  श्री भगवान बोले- भय का सर्वथा अभाव,  अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता,  तत्त्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरन्तर दृढ़ स्थिति और सात्त्विक दान ,  इन्द्रियों का दमन,  भगवान,  देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान्‌ के नाम और गुणों का कीर्तन,  स्वधर्म पालन के लिए कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता॥1॥
 (परमात्मा के स्वरूप को तत्त्व से जानने के लिए सच्चिदानन्दघन परमात्मा के स्वरूप में एकी भाव से ध्यान की निरन्तर गाढ़ स्थिति का ही नाम 'ज्ञानयोगव्यवस्थिति' समझना चाहिए)
   अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्‌। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्‌॥
 मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना,  यथार्थ और प्रिय भाषण , अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना,  कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्याग,  अन्तःकरण की उपरति अर्थात्‌ चित्त की चञ्चलता का अभाव,  किसी की भी निन्दादि न करना,  सब भूतप्राणियों में हेतुरहित दया,  इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना,  कोमलता,  लोक और शास्त्र से विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव॥2॥
(अन्तःकरण और इन्द्रियों के द्वारा जैसा निश्चय किया हो, वैसे-का-वैसा ही प्रिय शब्दों में कहने का नाम 'सत्यभाषण' है)
   तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहोनातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
 तेज ,  क्षमा,  धैर्य,  बाहर की शुद्धि एवं किसी में भी शत्रुभाव का न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव- ये सब तो हे अर्जुन! दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं॥3॥
(श्रेष्ठ पुरुषों की उस शक्ति का नाम 'तेज' है कि जिसके प्रभाव से उनके सामने विषयासक्त और नीच प्रकृति वाले मनुष्य भी प्रायः अन्यायाचरण से रुककर उनके कथनानुसार श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं)

A list of major 26 divine qualities that should be cultivated for salvation

The Supreme Lord said:  Fearlessness,  purity of the inner psyche,  perseverance in the yog of Self-knowledge,  charity,  sense-restraint,  sacrifice,  study of the scriptures,  austerity,  honesty;  nonviolence, truthfulness,  absence of anger,  renunciation,  calmness,  abstinence from malicious talk,  compassion for all creatures,  freedom from greed,  gentleness,  modesty,  absence of fickleness,  splendor,  forgiveness, fortitude,  cleanliness,  absence of malice, and  absence of pride --- these are the (twenty-six) qualities of those endowed with divine virtues, O Arjun. (16.01-03)

   दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च। अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्‌॥
 हे पार्थ! दम्भ,  घमण्ड और अभिमान तथा  क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी- ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं॥4॥
O Arjun, the marks of those who are born with demonic qualities are: Hypocrisy, arrogance, pride, anger, harshness, and ignorance. (16.04)
    दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
दैवी सम्पदा मुक्ति के लिए और आसुरी सम्पदा बाँधने के लिए मानी गई है।
Divine qualities lead to salvation (Moksh); the demonic qualities are said to be for bondage.

 द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
इस लोक में भूतों की सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला।
There are only two types of human beings, the wise and the ignorant: The divine, and the demonic


 Suffering is the destiny of the ignorant
   त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌॥
  काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले अर्थात्‌ उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए॥21॥
   Lust, anger, and greed are the three gates to hell

   तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
 इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है॥24॥
 Therefore, let the scripture be your authority in determining what should be done and what should not be done. You should perform your duty following the scriptural injunction. (16.24)








Monday, March 10, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 15 पुरुषोत्तमयोग

     ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌ । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌ ॥
  श्री भगवान बोले- आदिपुरुष परमेश्वर रूप मूल वाले और ब्रह्मारूप मुख्य शाखा वाले जिस संसार रूप पीपल वृक्ष को अविनाशी कहते हैं, तथा वेद जिसके पत्ते  कहे गए हैं, उस संसार रूप वृक्ष को जो पुरुष मूलसहित सत्त्व से जानता है, वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है। ॥1॥
आदिपुरुष नारायण वासुदेव भगवान ही नित्य और अनन्त तथा सबके आधार होने के कारण और सबसे ऊपर नित्यधाम में सगुणरूप से वास करने के कारण ऊर्ध्व नाम से कहे गए हैं और वे मायापति, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही इस संसाररूप वृक्ष के कारण हैं, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'ऊर्ध्वमूलवाला' कहते हैं
  उस आदिपुरुष परमेश्वर से उत्पत्ति वाला होने के कारण तथा नित्यधाम से नीचे ब्रह्मलोक में वास करने के कारण, हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मा को परमेश्वर की अपेक्षा 'अधः' कहा है और वही इस संसार का विस्तार करने वाला होने से इसकी मुख्य शाखा है, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'अधःशाखा वाला' कहते हैं
इस वृक्ष का मूल कारण परमात्मा अविनाशी है तथा अनादिकाल से इसकी परम्परा चली आती है, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'अविनाशी' कहते हैं
इस वृक्ष की शाखा रूप ब्रह्मा से प्रकट होने वाले और यज्ञादि कर्मों द्वारा इस संसार वृक्ष की रक्षा और वृद्धि करने वाले एवं शोभा को बढ़ाने वाले होने से वेद 'पत्ते' कहे गए हैं
भगवान्‌ की योगमाया से उत्पन्न हुआ संसार क्षणभंगुर, नाशवान और दुःखरूप है, इसके चिन्तन को त्याग कर केवल परमेश्वर ही नित्य-निरन्तर, अनन्य प्रेम से चिन्तन करना 'वेद के तात्पर्य को जानना' है
The Supreme Lord said: They speak of the eternal banyan tree that has its origin above in the Supreme Being (ParBrahm) and its branches below in the cosmos, and whose leaves are the Vedic hymns. One who understands this tree is a knower of the Vedas.

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥
 उस संसार वृक्ष की तीनों गुणोंरूप जल के द्वारा बढ़ी हुई एवं विषय-भोग रूप कोंपलोंवाली देव, मनुष्य और तिर्यक्‌ आदि योनिरूप शाखाएँ  नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं तथा मनुष्य लोक में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली अहंता-ममता और वासना रूप जड़ें भी नीचे और ऊपर सभी लोकों में व्याप्त हो रही हैं। ॥2॥
 शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध -ये पाँचों स्थूलदेह और इन्द्रियों की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण उन शाखाओं की 'कोंपलों' के रूप में कहे गए हैं।
मुख्य शाखा रूप ब्रह्मा से सम्पूर्ण लोकों सहित देव, मनुष्य और तिर्यक्‌ आदि योनियों की उत्पत्ति और विस्तार हुआ है, इसलिए उनका यहाँ 'शाखाओं' के रूप में वर्णन किया है
अहंता, ममता और वासनारूप मूलों को केवल मनुष्य योनि में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली कहने का कारण यह है कि अन्य सब योनियों में तो केवल पूर्वकृत कर्मों के फल को भोगने का ही अधिकार है और मनुष्य योनि में नवीन कर्मों के करने का भी अधिकार है
The branches of this cosmic tree of Maya (Illusion) spread all over the cosmos. The tree is nourished by three modes (Gunas) of material Nature (Prakriti); sense pleasures are its sprouts; and its roots of ego and desires stretch below in the human world, causing Karmic bondage. (15.02)

   न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा । अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्‍गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥
  इस संसार वृक्ष का स्वरूप जैसा कहा है वैसा यहाँ विचार काल में नहीं पाया जाता  क्योंकि न तो इसका आदि है और न अन्त है तथा न इसकी अच्छी प्रकार से स्थिति ही है  इसलिए इस अहंता, ममता और वासनारूप अति दृढ़ मूलों वाले संसार रूप पीपल के वृक्ष को दृढ़ वैराग्य रूप (ब्रह्मलोक तक के भोग क्षणिक और नाशवान हैं, ऐसा समझकर, इस संसार के समस्त विषयभोगों में सत्ता, सुख, प्रीति और रमणीयता का न भासना ही 'दृढ़ वैराग्यरूप शस्त्र' है) शस्त्र द्वारा काटकर ....॥3॥
(इस संसार का जैसा स्वरूप शास्त्रों में वर्णन किया गया है और जैसा देखा-सुना जाता है, वैसा तत्त्व ज्ञान होने के पश्चात नहीं पाया जाता, जिस प्रकार आँख खुलने के पश्चात स्वप्न का संसार नहीं पाया जाता
इसका आदि नहीं है, यह कहने का प्रयोजन
इसका अन्त नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि इसकी परम्परा कब तक चलती रहेगी, इसका कोई पता नहीं है यह है कि इसकी परम्परा कब से चली आ रही है, इसका कोई पता नहीं है
इसकी अच्छी प्रकार स्थिति भी नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि वास्तव में यह क्षणभंगुर और नाशवान है
स्थावर, जंगमरूप यावन्मात्र संसार के चिन्तन का तथा अनादिकाल से अज्ञान द्वारा दृढ़ हुई अहंता, ममता और वासना रूप मूलों का त्याग करना ही संसार वृक्ष का अवान्तर 'मूलों के सहित काटना' है।)
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥
 उसके पश्चात उस परम-पदरूप परमेश्वर को भलीभाँति खोजना चाहिए, जिसमें गए हुए पुरुष फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिस परमेश्वर से इस पुरातन संसार वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुष नारायण के मैं शरण हूँ- इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वर का मनन और निदिध्यासन करना चाहिए॥4॥
How to cut the tree of attachment and attain salvation by taking refuge in God
The real form of this tree is not perceptible here on earth, nor is its beginning, end, or existence. Having cut the firm roots --- the desires --- of this tree by the mighty ax of Self-knowledge and detachment; thus thinking: "I take refuse in that very primal person from which this primal manifestation comes forth", seek that supreme abode from where one does not come back (to the mortal world) again. (15.03-04)


निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्‌ ॥
 जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्ति रूप दोष को जीत लिया है, जिनकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं- वे सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं॥5॥
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥
 जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही, वही मेरा परम धाम  है॥6॥
The wise reach that eternal goal, who are free from pride and delusion, who have conquered the evil of attachment, who constantly dwell in the Supreme Self with all lust (Kaam) completely stilled, and who are free from dualities of pleasure and pain. (15.05) 
The sun does not illumine there, nor the moon, nor the fire. That is My supreme abode. Having reached there people do not come back (to the temporal world). (15.06)

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥
  इस देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है और वही इन प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है॥7॥
जैसे विभागरहित स्थित हुआ भी महाकाश घटों में पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है, वैसे ही सब भूतों में एकीरूप से स्थित हुआ भी परमात्मा पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है, इसी से देह में स्थित जीवात्मा को भगवान ने अपना 'सनातन अंश' कहा है
The eternal individual soul (Jeevaatma) in the body of living beings is, indeed, My integral part. It associates with the six sensory faculties of perception --- including the mind --- and activates them. (15.07)


  शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्‌ ॥
 वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादिका स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इन मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है- उसमें जाता है॥8॥
Just as the air takes aroma away from the flower; similarly, the individual soul (Jeevaatma) takes the six sensory faculties from the physical body it casts off during death to the new physical body it acquires in reincarnation (by the power of Karm).  (15.08)

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥
 यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचा को तथा रसना, घ्राण और मन को आश्रय करके -अर्थात इन सबके सहारे से ही विषयों का सेवन करता है॥9॥
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्‌ । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥
 शरीर को छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को अथवा विषयों को भोगते हुए को इस प्रकार तीनों गुणों से युक्त हुए को भी अज्ञानीजन नहीं जानते, केवल ज्ञानरूप नेत्रों वाले विवेकशील ज्ञानी ही तत्त्व से जानते हैं॥10॥
The living entity (Jeev) enjoys sense pleasures using six sensory faculties of hearing, touch, sight, taste, smell, and mind. The ignorant cannot perceive Jeev departing from the body, nor staying in the body and enjoying sense pleasures by associating with the modes of material Nature. But those who have the eye of Self-knowledge can see it. (15.09-10)

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्‌ । यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥
  यत्न करने वाले योगीजन भी अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को तत्त्व से जानते हैं, किन्तु जिन्होंने अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं जानते॥11॥
The yogis, striving for perfection, behold the living entity (Jeev) abiding in their inner psyche (as consciousness), but the ignorant and those whose inner psyche is not pure; even though striving, do not perceive Him. (15.11)

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्‌ । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्‌ ॥
  सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और जो अग्नि में है- उसको तू मेरा ही तेज जान॥12॥
Know the light energy to be Mine that comes from the sun and illumines the whole world, and is in the moon and in fire.  (15.12)

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥
 और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ और रसस्वरूप अर्थात अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण ओषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ॥13॥ 
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्‌ ॥
 मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाला प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर अग्नि रूप होकर चार

(भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य, ऐसे चार प्रकार के अन्न होते हैं, उनमें जो चबाकर खाया जाता है, वह 'भक्ष्य' है- जैसे रोटी आदि। जो निगला जाता है, वह 'भोज्य' है- जैसे दूध आदि तथा जो चाटा जाता है, वह 'लेह्य' है- जैसे चटनी आदि और जो चूसा जाता है, वह 'चोष्य' है- जैसे ईख आदि)
प्रकार के अन्न को पचाता हूँ॥14॥
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्‌ ॥
 मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (विचार द्वारा बुद्धि में रहने वाले संशय, विपर्यय आदि दोषों को हटाने का नाम 'अपोहन' है) होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य (सर्व वेदों का तात्पर्य परमेश्वर को जानने का है, इसलिए सब वेदों द्वारा 'जानने के योग्य' एक परमेश्वर ही है) हूँ तथा वेदान्त का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ॥15॥
Entering the earth, I support all beings with My energy. Becoming the sap-giving moon, I nourish all the plants. (15.13) Becoming the digestive fire, I remain in the body of all living beings. Uniting with vital life forces (Praan and Apaan), I digest all types of food. (15.14) And I am seated in the inner psyche of all beings. Memory, Self-knowledge, and removal of doubts and wrong notions (about the Eternal Being by reasoning, or in trance (Samaadhi)) come from Me. I am, in truth, that which is to be known by the study of all the Vedas. I am, indeed, the author of the Vedant and the knower of the Vedas. (15.15) 

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥
 इस संसार में नाशवान और अविनाशी भी ये दो प्रकार के पुरुष हैं। इनमें सम्पूर्ण भूतप्राणियों के शरीर तो नाशवान और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है॥16॥
(गीता अध्याय 7 श्लोक 4-5 में जो अपरा और परा प्रकृति के नाम से कहे गए हैं तथा अध्याय 13 श्लोक 1 में जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के नाम से कहे गए हैं, उन्हीं दोनों का यहाँ क्षर और अक्षर के नाम से वर्णन किया है)

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
 इन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा- इस प्रकार कहा गया है॥17॥
the supreme spirit, spirit and the individual soul
There are two entities (Purushas) in the cosmos: The changeable or temporal Divine Beings (Kshar Purush), and the unchangeable Eternal Being (Brahm, Akshar Purush). All created beings are subject to change, but the Eternal Being does not change. (15.16) There is another Supreme Personality of the Godhead (beyond both the temporal and the eternal) called the Absolute Reality or Paramaatma, who sustains both the temporal and the eternal (Kshar and Akshar) by pervading all three planetary spheres (Lokas) as the eternal Lord (Ishvar). (15.17)

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥
 क्योंकि मैं नाशवान जड़वर्ग- क्षेत्र से तो सर्वथा अतीत हूँ और अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ॥18॥
Because I am beyond both the temporal (Kshar) and the eternal (Akshar); therefore, I am known in this world and in the Veda as the Supreme Being (ParBrahm, Paramaatma, Purushottam, the Absolute, Truth, Sat, Supersoul, etc.). (15.18)

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्‌ । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
 भारत! जो ज्ञानी पुरुष मुझको इस प्रकार तत्त्व से पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरन्तर मुझ वासुदेव परमेश्वर को ही भजता है॥19॥
The wise, who truly understand Me as the Supreme Being (Purushottam), know everything and worship Me wholeheartedly, O Arjun.  (15.19)










श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 14 गुणत्रयविभागयोग

   # ज्ञानों में भी अतिउत्तम  परम ज्ञान #
  मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्‌ ।  सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥
  हे अर्जुन! मेरी महत्‌-ब्रह्मरूप मूल-प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है अर्थात गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनि में चेतन समुदायरूप गर्भ को स्थापन करता हूँ। उस जड़-चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पति होती है॥3॥
    सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।  तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥
 हे अर्जुन! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर्थात शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं, प्रकृति तो उन सबकी गर्भधारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापन करने वाला पिता हूँ॥4॥
All beings are born from the union of spirit and matter
My material Nature (Prakriti, mother nature) is the womb of creation wherein I place the seed (of Consciousness or Purush) from which all beings are born, O Arjun. (See also 9.10) (14.03) Whatever forms are produced in all different wombs, O Arjun, the material Nature (Prakriti) is their (body-giving) mother; and I, the Spiritual Being or Purush, am the (seed or life-giving) father. (14.04)

    सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्‌ ॥
 हे अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण -ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं॥5॥
Sattv or goodness, Rajas or passion, activity; and Tamas or ignorance, inertia --- these three modes (Ropes, Gunas) of material Nature (Prakriti) fetter the eternal individual soul (Jeev) to the body, O Arjun. (14.05)

     तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्‌ । सुखसङ्‍गेन बध्नाति ज्ञानसङ्‍गेन चानघ ॥
 हे निष्पाप! उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख के सम्बन्ध से और ज्ञान के सम्बन्ध से अर्थात उसके अभिमान से बाँधता है॥6॥
Of these, the mode of goodness (Sattv) is illuminating and good, because it is pure. Sattv fetters the living entity (Jeev) by attachment to happiness and knowledge, O sinless Arjun. (14.06)

    जो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्‍गसमुद्भवम्‌ । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्‍गेन देहिनम्‌ ॥
 हे अर्जुन! रागरूप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को कर्मों और उनके फल के सम्बन्ध में बाँधता है॥7॥
Arjun, know that the mode of passion (Rajas) is characterized by intense craving and is the source of desire and attachment. Rajas binds the living entity (Jeev) by attachment to (the fruits of) work. (14.07)

  तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्‌ । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥
  हे अर्जुन! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तो अज्ञान से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद (इंद्रियों और अंतःकरण की व्यर्थ चेष्टाओं का नाम 'प्रमाद' है), आलस्य (कर्तव्य कर्म में अप्रवृत्तिरूप निरुद्यमता का नाम 'आलस्य' है) और निद्रा द्वारा बाँधता है॥8॥
Know, O Arjun, that the mode of ignorance (Tamas) --- deluder of the living entity (Jeev)--- is born of inertia. Tamas binds Jeev by carelessness, laziness, and excessive sleep. (14.08)

    सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥
 हे अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में तथा तमोगुण तो ज्ञान को ढँककर प्रमाद में भी लगाता है॥9॥
O Arjun, the mode of goodness attaches one to happiness (of learning and knowing the Eternal Being); the mode of passion attaches to action; and the mode of ignorance attaches to negligence by covering Self-knowledge. (14.09)

  रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥
  हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण होता है अर्थात बढ़ता है॥10॥
Goodness prevails by suppressing passion and ignorance; passion prevails by suppressing goodness and ignorance; and ignorance prevails by suppressing goodness and passion, O Arjun. (14.10)

When the light of Self-knowledge illuminates all the senses (or gates) in the body, then it should be known that goodness is predominant. (14.11) O Arjun, when passion is predominant; greed, activity, undertaking of selfish works, restlessness, excitement, etc. arise. (14.12) O Arjun, when inertia is predominant; ignorance, inactivity, carelessness, delusion, etc. arise. (14.13) 

जब यह मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है॥14॥
रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ मनुष्य कीट, पशु आदि मूढ़योनियों में उत्पन्न होता है॥15॥

    कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्‌ । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्‌ ॥
श्रेष्ठ कर्म का तो सात्त्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है॥16॥
   The fruit of good action is said to be beneficial and pure; the fruit of passionate action is pain; and the fruit of ignorant action is laziness. (14.16)
    सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥
 सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुण से निःसन्देह लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद और मोह  उत्पन्न होते हैं और अज्ञान भी होता है॥17॥
  Self-knowledge arises from the mode of goodness; greed arises from the mode of passion; and negligence, delusion, and slowness of mind arise from the mode of ignorance. (14.17)


सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं,
रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात मनुष्य लोक में ही रहते हैं और
तमोगुण के कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादि में स्थित तामस पुरुष अधोगति को अर्थात कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते हैं॥18॥

    नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥
 जिस समय दृष्टा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यन्त परे सच्चिदानन्दघनस्वरूप मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानता है, उस समय वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है॥19॥
When visionaries perceive no doer other than the powers of Eternal Being --- the modes (Gunas) of material Nature; and know That which is above and beyond these Gunas, then they attain salvation (Mukti).



  गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्‌ । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥
 यह पुरुष शरीर की (बुद्धि, अहंकार और मन तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत, पाँच इन्द्रियों के विषय- इस प्रकार इन तेईस तत्त्वों का पिण्ड रूप यह स्थूल शरीर प्रकृति से उत्पन्न होने वाले गुणों का ही कार्य है, इसलिए इन तीनों गुणों को इसी की उत्पत्ति का कारण कहा है) उत्पत्ति के कारणरूप इन तीनों गुणों को उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है॥20॥
When one transcends (or rises above) the three modes of material Nature that create (and/or originate in) the body, one attains immortality or salvation (Mukti) and is freed from the pains of birth, old age, and death. (14.20)


जो निरन्तर आत्म भाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समान भाव वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला और अपनी निन्दा-स्तुति में भी समान भाव वाला है॥24॥
जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता है॥25॥
और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति योग द्वारा मुझको निरन्तर भजता है, वह भी इन तीनों गुणों को भलीभाँति लाँघकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होने के लिए योग्य बन जाता है॥26॥
(केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर वासुदेव भगवान को ही अपना स्वामी मानता हुआ, स्वार्थ और अभिमान को त्याग कर श्रद्धा और भाव सहित परम प्रेम से निरन्तर चिन्तन करने को 'अव्यभिचारी भक्तियोग' कहते हैं)
क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का आश्रय मैं हूँ॥27॥



Sunday, March 9, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 13 क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग

   अर्जुन  उवाच प्रकृतिं  पुरुषं  चैव  क्षेत्रम  क्षेत्रक्षमेव एतद् वेंदितुं  इच्छामि  जननं    जनेयं  च  केसव
Arjuna said: O my dear Krishna, I wish to know about prakriti [nature], purusha [the enjoyer], and the field and the knower of the field, and of knowledge and the object of knowledge.
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥
 श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! यह शरीर 'क्षेत्र'  इस नाम से कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसको 'क्षेत्रज्ञ' इस नाम से उनके तत्व को जानने वाले ज्ञानीजन कहते हैं॥1॥
The Supreme Personality of Godhead said: This body, O son of Kunti, is called the field, and one who knows this body is called the knower of the field.

O scion of Bharata, you should understand that I am also the knower in all bodies, and to understand this body and its knower is called knowledge. That is My opinion.
 क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥
हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ अर्थात जीवात्मा भी मुझे ही को जान और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को अर्थात विकार सहित प्रकृति और पुरुष का जो तत्व से जानना है  वह ज्ञान है- ऐसा मेरा मत है॥
 O Arjun, know Me to be the creator of all the creation. The true understanding of both the creator and the creation is considered by Me to be the transcendental (or metaphysical) knowledge.

          महाभूतान्यहङ्‍कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥
  पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच इन्द्रियों के विषय अर्थात शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध॥5॥
    इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्‍घातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्‌ ॥
  तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देहका पिण्ड, चेतना (शरीर और अन्तःकरण की एक प्रकार की चेतन-शक्ति।) और धृति -- इस प्रकार विकारों (पाँचवें श्लोक में कहा हुआ तो क्षेत्र का स्वरूप समझना चाहिए और इस श्लोक में कहे हुए इच्छादि क्षेत्र के विकार समझने चाहिए।) के सहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया॥
The primary material Nature (Aadi Prakriti or Avyakt), cosmic intellect (Mahat), "I" consciousness or ego, five basic elements, ten organs, mind, five sense objects; and desire, hatred, pleasure, pain, the physical body, consciousness, and resolve --- thus the entire field has been briefly described with its transformations.
     अमानित्वमदम्भित्व- महिंसा क्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं  स्थैर्यमात्मविनिग्रहः
  श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदि की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, अन्तःकरण की स्थिरता और मन-इन्द्रियों सहित शरीर का निग्रह॥

      इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम- नहंकार एव च । जन्ममृत्युजराव्याधि दुःखदोषानुदर्शनम् ॥
   इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों में आसक्ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना॥

असक्तिरनभिष्वङ्गः  पुत्रदारगृहादिषु । नित्यं च समचित्तत्व- मिष्टानिष्टोपपत्तिषु 
पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव, ममता का न होना तथा प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना॥
 मयि चानन्ययोगेन  भक्तिरव्यभिचारिणी । विविक्तदेशसेवित्व- मरतिर्जनसंसदि ॥
मुझ परमेश्वर में अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति
(केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर को ही अपना स्वामी मानते हुए स्वार्थ और अभिमान का त्याग करके, श्रद्धा और भाव सहित परमप्रेम से भगवान का निरन्तर चिन्तन करना 'अव्यभिचारिणी' भक्ति है)
तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना॥
 अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं  तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्त- मज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥
अध्यात्म ज्ञान में
(जिस ज्ञान द्वारा आत्मवस्तु और अनात्मवस्तु जानी जाए, उस ज्ञान का नाम 'अध्यात्म ज्ञान' है)
नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को ही देखना- यह सब ज्ञान है और
जो इसके विपरीत है वह अज्ञान है- ऐसा कहा है॥
Humility,   modesty,     nonviolence,      forgiveness,       honesty,      service to guru,      purity (of thought, word, and deed),   steadfastness,   self-control; and    aversion towards sense objects,    absence of ego; constant reflection on pain and suffering inherent in birth, old age, disease, and death; (13.07-08)
detached attachment with family members, home, etc.;      unfailing calmness upon attainment of the desirable and the undesirable; and     unswerving devotion to Me through single-minded contemplation, taste for solitude,   distaste for social gatherings and gossips;     steadfastness in acquiring the knowledge of Eternal Being (Brahm), and     seeing the omnipresent Supreme Being (ParBrahm, Krishn) everywhere --- this is said to be knowledge. That which is contrary to this is ignorance. (13.09-11)
            ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि  यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते । अनादि मत्परं ब्रह्म  न सत्तन्नासदुच्यते ॥
  जो जानने योग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा। वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत्‌ ही कहा जाता है, न असत्‌ ही॥
I shall fully describe the object of knowledge --- knowing which one attains immortality. The beginningless Supreme Being (ParBrahm) is said to be neither eternal (Sat) nor temporal (Asat).

           सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।सर्वतः श्रुतिमल्लोके  सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
 वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है, क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। 
(आकाश जिस प्रकार वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी का कारण रूप होने से उनको व्याप्त करके स्थित है, वैसे ही परमात्मा भी सबका कारण रूप होने से सम्पूर्ण चराचर जगत को व्याप्त करके स्थित है) The Eternal Being (Brahm) has His hands, feet, eyes, head, mouth, and ears everywhere, because He is all-pervading and omnipresent.
                 सर्वेन्द्रियगुणाभासं  सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव  निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥
     वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाला है॥
He is the perceiver of all sense objects without the physical sense organs; unattached, and yet the sustainer of all; devoid of three modes (Gunas) of material Nature (Prakriti), and yet the enjoyer of the Gunas of Prakriti (by becoming a living entity (Jeev)).
                  बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञयं दूरस्थं चान्तिके च तत्‌ ॥
    वह चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है। और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय (जैसे सूर्य की किरणों में स्थित हुआ जल सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है, वैसे ही सर्वव्यापी परमात्मा भी सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है) है तथा अति समीप में (वह परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण और सबका आत्मा होने से अत्यन्त समीप है) और दूर में (श्रद्धारहित, अज्ञानी पुरुषों के लिए न जानने के कारण बहुत दूर है) भी स्थित वही है॥

He is inside as well as outside all beings, animate and inanimate. He is incomprehensible because of His subtlety. And because of His omnipresence, He is very near --- residing in one’s inner psyche; as well as far away --- in the Supreme Abode (ParamDhaam).


          अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌ । भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥
   वह परमात्मा विभागरहित एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण होने पर भी चराचर सम्पूर्ण भूतों में विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है 
(जैसे महाकाश विभागरहित स्थित हुआ भी घड़ों में पृथक-पृथक के सदृश प्रतीत होता है, वैसे ही परमात्मा सब भूतों में एक रूप से स्थित हुआ भी पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है) 
तथा वह जानने योग्य परमात्मा विष्णुरूप से भूतों को धारण-पोषण करने वाला और रुद्ररूप से संहार करने वाला तथा ब्रह्मारूप से सबको उत्पन्न करने वाला है॥
He is undivided, and yet appears to exist as if divided in beings. He, the object of knowledge, appears as: Brahmaa, the creator; Vishnu, the sustainer; and Shiva, the destroyer of all beings.


          ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्‌ ॥
   वह परब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति  एवं माया से अत्यन्त परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोधस्वरूप, जानने के योग्य एवं तत्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है॥
ParBrahm, the Supreme Person, is the source of all light. He is said to be beyond darkness (of ignorance or Maya). He is the Self-knowledge, the object of Self-knowledge, and seated in the inner psyche (or the causal heart as consciousness  of all beings, He is to be realized by Self-knowledge (Jnaan, Taaratamya Jnaan, Brahm-vidyaa).
      इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥
  इस प्रकार क्षेत्र (श्लोक 5-6 में विकार सहित क्षेत्र का स्वरूप कहा है) तथा ज्ञान (श्लोक 7 से 11 तक ज्ञान अर्थात ज्ञान का साधन कहा है।) और जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप (श्लोक 12 से 17 तक ज्ञेय का स्वरूप कहा है) संक्षेप में कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्व से जानकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है॥
Thus the creation as well as the knowledge and the object of knowledge have been briefly described by Me. Understanding this, My devotee attains My supreme abode.
       प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्‌यनादी उभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्‌ ॥
   प्रकृति और पुरुष- इन दोनों को ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारों को तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न जान॥
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥
 कार्य (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध -इनका नाम 'कार्य' है) और
करण (बुद्धि, अहंकार और मन तथा श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और घ्राण एवं वाक्‌, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा- इन 13 का नाम 'करण' है) को उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और
जीवात्मा सुख-दुःखों के भोक्तपन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है॥
A description of the supreme spirit, spirit, material nature, and the individual souls

Know that both the material Nature (Prakriti) and the Spiritual Being (Purush) are beginningless. All manifestations and three dispositions of mind and matter, called modes or Gunas, are born of Prakriti. Prakriti is said to be the cause of production of the physical body and the eleven organs (of perception and action). Purush (Consciousness, Spirit) is said to be the cause of experiencing pleasure and pain.

    पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्‍क्ते प्रकृतिजान्गुणान्‌ । कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥
 प्रकृति में 
(प्रकृति शब्द का अर्थ गीता अध्याय 7 श्लोक 14 में कही हुई भगवान की त्रिगुणमयी माया समझना चाहिए) 
स्थित ही पुरुष प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है और इन गुणों का संग ही इस जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है। 
(सत्त्वगुण के संग से देवयोनि में एवं रजोगुण के संग से मनुष्य योनि में और तमो गुण के संग से पशु आदि नीच योनियों में जन्म होता है।)॥21॥
 Spiritual Being (Purush) enjoys three modes (Gunas) of material Nature (Prakriti) by associating with Prakriti. Attachment to the Gunas (due to ignorance caused by previous Karm) is the cause of birth of the living entity (Jeev) in good and evil wombs. (13.21)
      उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥
 इस देह में स्थित यह आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है। वह साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता, सबका धारण-पोषण करने वाला होने से भर्ता, जीवरूप से भोक्ता, ब्रह्मा आदि का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होने से परमात्मा- ऐसा कहा गया है॥22॥
Eternal Being (Brahm, Atma, Spirit) in the body is also called the witness, the guide, the supporter, the enjoyer, the great Lord, and also the Supreme Self. (13.22)


   य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥
 इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य तत्व से जानता है
(दृश्यमात्र सम्पूर्ण जगत माया का कार्य होने से क्षणभंगुर, नाशवान, जड़ और अनित्य है तथा
 जीवात्मा नित्य, चेतन, निर्विकार और अविनाशी एवं शुद्ध, बोधस्वरूप, सच्चिदानन्दघन परमात्मा का ही सनातन अंश है, इस प्रकार समझकर सम्पूर्ण मायिक पदार्थों के संग का सर्वथा त्याग करके परम पुरुष परमात्मा में ही एकीभाव से नित्य स्थित रहने का नाम उनको 'तत्व से जानना' है)
वह सब प्रकार से कर्तव्य कर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता॥23॥
They who truly understand Spiritual Being (Purush) and the material Nature (Prakriti) with its three modes (Gunas) are not born again, regardless of their way of life. (13.23)


    ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । अन्ये साङ्‍ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥
 उस परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि से ध्यान (जिसका वर्णन गीता अध्याय 6 में श्लोक 11 से 32 तक विस्तारपूर्वक किया है) द्वारा हृदय में देखते हैं,
अन्य कितने ही ज्ञानयोग (जिसका वर्णन गीता अध्याय 2 में श्लोक 11 से 30 तक विस्तारपूर्वक किया है) द्वारा और
 दूसरे कितने ही कर्मयोग (जिसका वर्णन गीता अध्याय 2 में श्लोक 40 से अध्याय समाप्तिपर्यन्त विस्तारपूर्वक किया है) द्वारा देखते हैं अर्थात प्राप्त करते हैं॥24॥
Some perceive the supersoul (Paramaatma) in their inner psyche through mind and intellect that have been purified either by meditation, or by metaphysical knowledge, or by KarmaYog. (13.24)

   यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति । तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
 जिस क्षण यह पुरुष भूतों के पृथक-पृथक भाव को एक परमात्मा में ही स्थित तथा उस परमात्मा से ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, उसी क्षण वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है॥
The moment one discovers the diverse variety of beings and their ideas abiding in One and coming out from That alone, one attains the Supreme Being (ParBrahm). (13.30)
क्षेत्र को जड़, विकारी, क्षणिक और नाशवान तथा क्षेत्रज्ञ को नित्य, चेतन, अविकारी और अविनाशी जानना ही 'उनके भेद को जानना' है
   क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्‌ ॥
 इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को
 (क्षेत्र को जड़, विकारी, क्षणिक और नाशवान तथा क्षेत्रज्ञ को नित्य, चेतन, अविकारी और अविनाशी जानना ही 'उनके भेद को जानना' है) 
तथा कार्य सहित प्रकृति से मुक्त होने को जो पुरुष ज्ञान नेत्रों द्वारा तत्व से जानते हैं, वे महात्माजन परम ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं॥34॥

They attain the Supreme, who perceive the difference between creation (or the body) and the creator (or the Atma) with the eye of Self-knowledge, and know the technique (by using any one of the five paths---Selfless service, Knowledge, Devotion, Meditation, and Surrender) of liberation of the living entity (Jeev) from the trap of divine illusory energy (Maya). (13.34)