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Sunday, March 16, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 18 मोक्षसंन्यासयोग

   यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्‌ । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्‌ ॥
 यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याग करने के योग्य नहीं है, बल्कि वह तो अवश्य कर्तव्य है, क्योंकि यज्ञ, दान और तप -ये तीनों ही कर्म बुद्धिमान पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं॥5॥
(वह मनुष्य बुद्धिमान है, जो फल और आसक्ति को त्याग कर केवल भगवदर्थ कर्म करता है।)
Definition of renunciation and sacrifice
Acts of service, charity, and austerity should not be abandoned, but should be performed because service, charity, and austerity are the purifiers of the wise. (18.05)

 एतान्यपि तु कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानीति में पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्‌ ॥
 इसलिए हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिए, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है॥6॥
Even these obligatory works should be performed without attachment to the fruits. This is My definite supreme advice, O Arjun. (18.06)

   नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते । मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥
 (निषिद्ध और काम्य कर्मों का तो स्वरूप से त्याग करना उचित ही है)
परन्तु नियत कर्म का  स्वरूप से त्याग करना उचित नहीं है। इसलिए मोह के कारण उसका त्याग कर देना तामस त्याग कहा गया है॥7॥
Giving up one's duty is not proper. The abandonment of obligatory work is due to delusion and is declared to be in the mode of ignorance. (18.07)

    दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्‌ । स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्‌ ॥
  जो कुछ कर्म है वह सब दुःखरूप ही है- ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेश के भय से कर्तव्य-कर्मों का त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को किसी प्रकार भी नहीं पाता॥8॥
One who abandons duty merely because it is difficult or because of fear of bodily affliction, does not get the benefits of sacrifice by performing such a sacrifice in the mode of passion. (18.08)
for example sonia gandhi's 'tyag' after 2004 election

    कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेअर्जुन । सङ्‍गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥
  हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है- इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है- वही सात्त्विक त्याग माना गया है॥9॥
 Obligatory work performed as duty, renouncing selfish attachment to the fruit, is alone to be regarded as sacrifice in the mode of goodness, O Arjun. (18.09)

    न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते । त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥
 जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है॥10॥
One who neither hates a disagreeable work, nor is attached to an agreeable work, is considered a renunciant (Tyaagi), imbued with the mode of goodness, intelligent, and free from all doubts about the Supreme Being. (18.10)

   न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥
 क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्य द्वारा सम्पूर्णता से सब कर्मों का त्याग किया जाना शक्य नहीं है, इसलिए जो कर्मफल त्यागी है, वही त्यागी है- यह कहा जाता है॥11॥
Human beings cannot completely abstain from work. Therefore, one who completely renounces selfish attachment to the fruits of all work is considered a renunciant. (18.11)

  अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्‌ । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्‌ ॥
 कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा, बुरा और मिला हुआ- ऐसे तीन प्रकार का फल मरने के पश्चात अवश्य होता है, किन्तु कर्मफल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल किसी काल में भी नहीं होता॥12॥
The threefold fruit of works --- desirable, undesirable, and mixed --- accrues after death to the one who is not a Tyaagi (Renunciant), but never to a Tyaagi. (18.12)

       पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे । साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्‌ ॥
   हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के ये पाँच हेतु कर्मों का अंत करने के लिए उपाय बतलाने वाले सांख्य-शास्त्र में कहे गए हैं, उनको तू मुझसे भलीभाँति जान॥13॥
     अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्‌ । विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्‌ ॥
  इस विषय में अर्थात कर्मों की सिद्धि में
अधिष्ठान (जिसके आश्रय कर्म किए जाएँ, उसका नाम अधिष्ठान है) और
कर्ता तथा
भिन्न-भिन्न प्रकार के करण (जिन-जिन इंद्रियादिकों और साधनों द्वारा कर्म किए जाते हैं, उनका नाम करण है) एवं
नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और
वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव (पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों के संस्कारों का नाम दैव है) है॥14॥

   शरीरवाङ्‍मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥
  मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है- उसके ये पाँचों कारण हैं॥15॥
Five causes of an actionLearn from Me, O Arjun, the five causes, as described in the Saamkhya doctrine, for the accomplishment of all actions. They are: The physical body, the seat of Karm; the modes (Gunas) of material Nature, the doer; the eleven organs of perception and action, the instruments; various Praanas (bioimpulses, life forces); and the fifth is presiding deities (of the eleven organs) fate. (18.13-14)
 Fate is only 1 of 5 causative factor of an action - karm

 These are the five causes of whatever action, whether right or wrong, one performs by thought, word and deed. (18.15)


       तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥
 परन्तु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि (सत्संग और शास्त्र के अभ्यास से तथा भगवदर्थ कर्म और उपासना के करने से मनुष्य की बुद्धि शुद्ध होती है, इसलिए जो उपर्युक्त साधनों से रहित है, उसकी बुद्धि अशुद्ध है, ऐसा समझना चाहिए।) होने के कारण उस विषय में यानी कर्मों के होने में केवल शुद्ध स्वरूप आत्मा को कर्ता समझता है, वह मलीन बुद्धि वाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता॥16॥
Therefore, the ignorant, who consider one’s body or the soul as the sole agent, do not understand due to imperfect knowledge. (18.16) 

   यस्य नाहङ्‍कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥

जिस पुरुष के अन्तःकरण में 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और कर्मों में लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मरता है और न पाप से बँधता है।
(
जैसे अग्नि, वायु और जल द्वारा प्रारब्धवश किसी प्राणी की हिंसा होती देखने में आए तो भी वह वास्तव में हिंसा नहीं है, वैसे ही जिस पुरुष का देह में अभिमान नहीं है और स्वार्थरहित केवल संसार के हित के लिए ही जिसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ होती हैं, उस पुरुष के शरीर और इन्द्रियों द्वारा यदि किसी प्राणी की हिंसा होती हुई लोकदृष्टि में देखी जाए, तो भी वह वास्तव में हिंसा नहीं है क्योंकि आसक्ति, स्वार्थ और अहंकार के न होने से किसी प्राणी की हिंसा हो ही नहीं सकती तथा बिना कर्तृत्वाभिमान के किया हुआ कर्म वास्तव में अकर्म ही है, इसलिए वह पुरुष 'पाप से नहीं बँधता'।)॥17॥

One who is free from the notion of doership and whose intellect is not polluted by the desire to reap the fruit --- even after slaying all these people --- neither slays nor is bound by the act of killing. (18.17)
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना motive impelling to ritual acts। करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥
 ज्ञाता (जानने वाले का नाम 'ज्ञाता' है।), 
ज्ञान (जिसके द्वारा जाना जाए, उसका नाम 'ज्ञान' है। ) और 
ज्ञेय (जानने में आने वाली वस्तु का नाम 'ज्ञेय' है।)- ये तीनों प्रकार की कर्म-प्रेरणा हैं और 
कर्ता (कर्म करने वाले का नाम 'कर्ता' है।), 
करण (जिन साधनों से कर्म किया जाए, उनका नाम 'करण' है।) तथा 
क्रिया (करने का नाम 'क्रिया' है।)- ये तीनों प्रकार का कर्म-संग्रह है॥18॥
The subject, the object, and the knowledge of the object are the threefold driving force (or impetus) to an action. The eleven organs (of perception and action), the act, and the agent or the modes (Gunas) of material Nature are the three components of action. (18.18)

   सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥
  जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब भूतों में एक अविनाशी परमात्मभाव को विभागरहित समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक जान॥20॥
The knowledge by which one sees a single immutable Reality in all beings as undivided in the divided, such knowledge is in the mode of goodness.  (18.20)

   पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्‌ । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्‌ ॥
किन्तु जो ज्ञान अर्थात जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को तू राजस जान॥21॥
The knowledge by which one sees different realities of various types among all beings as separate from one another; such knowledge is in the mode of passion. (18.21)

  यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्‌। अतत्त्वार्थवदल्पंच तत्तामसमुदाहृतम्‌॥
  परन्तु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्त्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है- वह तामस कहा गया है॥22॥
The irrational, baseless, and worthless knowledge by which one clings to one single effect (such as the body) as if it is everything, such knowledge is declared to be in the mode of darkness of ignorance (18.22)

   नियतं सङ्‍गरहितमरागद्वेषतः कृतम। अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥
 जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष के किया गया हो- वह सात्त्विक कहा जाता है॥23॥
Obligatory duty performed without likes and dislikes and without selfish motives and attachment to enjoy the fruit, is said to be in the mode of goodness. (18.23)

  यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्‍कारेण वा पुनः। क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्‌॥
 परन्तु जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त होता है तथा भोगों को चाहने वाले पुरुष द्वारा या अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है॥24॥
Action performed with ego, with selfish motives, and with too much effort, is in the mode of passion. (18.24)
   
   अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्‌ । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥
 जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है॥25॥
Action that is undertaken because of delusion, disregarding consequences, loss, injury to others, as well as one’s own ability, is said to be in the mode of ignorance. (18.25)

   मुक्तसङ्‍गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥
 जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष -शोकादि विकारों से रहित है- वह सात्त्विक कहा जाता है॥26॥
The agent who is free from attachment, is non-egotistic, endowed with resolve and enthusiasm, and unperturbed in success or failure is called good. (18.26)

  रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः। हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥
  जो कर्ता आसक्ति से युक्त कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है वह राजस कहा गया है॥27॥
The agent who is impassioned, who desires the fruits of work, who is greedy, violent, impure, and gets affected by joy and sorrow; is called passionate. (18.27)

    आयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥
 जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला तथा शोक करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री
(दीर्घसूत्री उसको कहा जाता है कि जो थोड़े काल में होने लायक साधारण कार्य को भी फिर कर लेंगे, ऐसी आशा से बहुत काल तक नहीं पूरा करता। )
है वह तामस कहा जाता है॥28॥
The agent who is undisciplined, vulgar, stubborn, wicked, malicious, lazy, depressed, and procrastinating is called ignorant. (18.28)

   प्रवत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। बन्धं मोक्षं च या वेति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
  हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग
(गृहस्थ में रहते हुए फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदर्पण बुद्धि से केवल लोकशिक्षा के लिए राजा जनक की भाँति बरतने का नाम 'प्रवृत्तिमार्ग' है।) और निवृत्ति मार्ग को
(देहाभिमान को त्यागकर केवल सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव स्थित हुए श्री शुकदेवजी और सनकादिकों की भाँति संसार से उपराम होकर विचरने का नाम 'निवृत्तिमार्ग' है।), कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ जानती है- वह बुद्धि सात्त्विकी है ॥30॥
O Arjun, that intellect is in the mode of goodness which understands the path of work and the path of renunciation, right and wrong action, fear and fearlessness, bondage and liberation. (18.30)

   यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥
 हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है॥31॥
That intellect is in the mode of passion which cannot distinguish between righteousness (Dharm) and unrighteousness (Adharm), and right and wrong action, O Arjun. (18.31)

  अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥
 हे अर्जुन! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी 'यह धर्म है' ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है॥32॥
That intellect is in the mode of ignorance which, when covered by ignorance, accepts unrighteousness (Adharm) as righteousness (Dharm) and thinks everything to be that which it is not, O Arjun. (18.32)

Three types of resolve, and the four goals of human life
   धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
 हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति
 (भगवद्विषय के सिवाय अन्य सांसारिक विषयों को धारण करना ही व्यभिचार दोष है, उस दोष से जो रहित है वह 'अव्यभिचारिणी धारणा' है।)
से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं
 ( मन, प्राण और इंद्रियों को भगवत्प्राप्ति के लिए भजन, ध्यान और निष्काम कर्मों में लगाने का नाम 'उनकी क्रियाओं को धारण करना' है।)
को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है॥33॥
That resolve is in the mode of goodness by which one manipulates the functions of the mind, Praan (bioimpulses, life forces) and senses for God-realization only, O Arjun. (18.33)

   यया तु धर्मकामार्थान्धत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्‍गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥
 परंतु हे पृथापुत्र अर्जुन! फल की इच्छावाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्ति से धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारण शक्ति राजसी है॥34॥
That resolve is in the mode of passion by which one, craving for the fruits of work, clings to Dharm (Duty), Arth (Wealth), and Kaam (Pleasure) with great attachment. (18.34)

   यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च। न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥
 हे पार्थ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिंता और दु:ख को तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता अर्थात धारण किए रहता है- वह धारण शक्ति तामसी है॥35॥
That resolve is in the mode of ignorance by which a dull person does not give up sleep, fear, grief, despair, and carelessness, O Arjun. (18.35)

    Three types of pleasure
    सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥
    यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्‌। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्‌॥
  हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अंत को प्राप्त हो जाता है, जो ऐसा सुख है, वह आरंभकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत (जैसे खेल में आसक्ति वाले बालक को विद्या का अभ्यास मूढ़ता के कारण प्रथम विष के तुल्य भासता है वैसे ही विषयों में आसक्ति वाले पुरुष को भगवद्भजन, ध्यान, सेवा आदि साधनाओं का अभ्यास मर्म न जानने के कारण प्रथम 'विष के तुल्य प्रतीत होता' है) होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है, इसलिए वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है॥36-37॥
And now hear from Me, O Arjun, about the threefold pleasure. The pleasure that one enjoys from spiritual practice results in cessation of all sorrows. (18.36) 
The pleasure that appears as poison in the beginning, but is like nectar in the end, comes by the grace of Self-knowledge and is in the mode of goodness. (18.37)

   विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्‌। परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्‌॥
 जो सुख विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है, वह पहले- भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य (बल, वीर्य, बुद्धि, धन, उत्साह और परलोक का नाश होने से विषय और इंद्रियों के संयोग से होने वाले सुख को 'परिणाम में विष के तुल्य' कहा है) है इसलिए वह सुख राजस कहा गया है॥38॥
Sensual pleasures that appear as nectars in the beginning, but become poison in the end, are in the mode of passion. (18.38) 

   यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः। निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥
 जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है॥39॥
  Pleasure that confuses a person in the beginning and in the end as a result of sleep, laziness, and carelessness, is in the mode of ignorance. (18.39)

    न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः। सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिःस्यात्त्रिभिर्गुणैः॥
 पृथ्वी में या आकाश में अथवाThere is no being, either on the earth or among the celestial controllers (Devas) in the heaven, who can remain free from these three modes (Gunas) of material Nature (Prakriti). (18.40)  देवताओं में तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो॥40॥
वर्ण धर्मDivision of labor is based on one’s ability

  ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥
 हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं॥41॥
The division of labor into the four categories --- Braahman, Kshatriya, Vaishya, and Shudr --- is also based on the qualities inherent in people’s nature (or the natural propensities, and not necessarily as one’s birth right), O Arjun.  (18.41)

   शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌ ॥
 अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में देखना चाहिए)
रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना- ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं॥42॥
Intellectuals who have serenity, self-control, austerity, purity, patience, honesty, transcendental knowledge, transcendental experience, and belief in God are labeled as Braahmans. (18.42)

   शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌॥
 शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं॥43॥Those having the qualities of heroism, vigor, firmness, dexterity, steadfastness in battle, charity, and administrative skills are called Kshatriyas or protectors. (18.43)

  कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्‌। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्‌॥
  खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार 
(वस्तुओं के खरीदने और बेचने में तौल, नाप और गिनती आदि से कम देना अथवा अधिक लेना एवं वस्तु को बदलकर या एक वस्तु में दूसरी या खराब वस्तु मिलाकर दे देना अथवा अच्छी ले लेना तथा नफा, आढ़त और दलाली ठहराकर उससे अधिक दाम लेना या कम देना तथा झूठ, कपट, चोरी और जबरदस्ती से अथवा अन्य किसी प्रकार से दूसरों के हक को ग्रहण कर लेना इत्यादि दोषों से रहित जो सत्यतापूर्वक पवित्र वस्तुओं का व्यापार है उसका नाम 'सत्य व्यवहार' है।) ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है॥44॥Those who are good at cultivation, cattle rearing, business, trade, and industry are known as Vaishyas. Those who are very good in service and labor type work are classed as Shudras. (18.44)

  सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्‌। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥
अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धूएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं॥48॥
  (प्रकृति के अनुसार शास्त्र विधि से नियत किए हुए वर्णाश्रम के धर्म और सामान्य धर्मरूप स्वाभाविक कर्म हैं उनको ही यहाँ स्वधर्म, सहज कर्म, स्वकर्म, नियत कर्म, स्वभावज कर्म, स्वभावनियत कर्म इत्यादि नामों से कहा है)
   स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
 अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन॥45॥
One can attain the highest perfection by devotion to one’s natural work. Listen to Me how one attains perfection while engaged in one’s natural work. (18.45)

  यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्‌। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥
 जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत्‌ व्याप्त है 
(जैसे बर्फ जल से व्याप्त है, वैसे ही संपूर्ण संसार सच्चिदानंदघन परमात्मा से व्याप्त है), 
उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके 
(जैसे पतिव्रता स्त्री पति को सर्वस्व समझकर पति का चिंतन करती हुई पति के आज्ञानुसार पति के ही लिए मन, वाणी, शरीर से कर्म करती है, वैसे ही परमेश्वर को ही सर्वस्व समझकर परमेश्वर का चिंतन करते हुए परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार मन, वाणी और शरीर से परमेश्वर के ही लिए स्वाभाविक कर्तव्य कर्म का आचरण करना 'कर्म द्वारा परमेश्वर को पूजना' है) 
मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है॥46॥
One attains perfection by worshipping the Supreme Being --- from whom all beings originate, and by whom all this universe is pervaded --- through performance of one’s natural duty for Him.(18.46)
 

  श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌॥
 अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता॥47॥
 One’s inferior natural work is better than superior unnatural work even though well performed. One who does the work ordained by one’s inherent nature (without selfish motives) incurs no sin (or Karmic reaction). (18.47)

   सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्‌। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥
  अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म
 (प्रकृति के अनुसार शास्त्र विधि से नियत किए हुए वर्णाश्रम के धर्म और सामान्य धर्मरूप स्वाभाविक कर्म हैं उनको ही यहाँ स्वधर्म, सहज कर्म, स्वकर्म, नियत कर्म, स्वभावज कर्म, स्वभावनियत कर्म इत्यादि नामों से कहा है)
को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धूएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं॥48॥

   One’s natural work, even though defective, should not be abandoned, because all undertakings are enveloped by defects as fire is covered by smoke, O Arjun. (18.48)

 this is pretty lose shlocks & lose words -  स्वाभाविक कर्तव्य कर्म , स्वभावनियतं कर्म, स्वधर्मरूप कर्म, स्वधर्म,  परधर्म   सहजं कर्म,  स्वकर्म easily can wrongly interpreted

 असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥
 सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अंतःकरण वाला पुरुष सांख्ययोग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है॥49॥
The person whose mind is always free from selfish attachment, who has subdued the mind and senses, and who is free from desires, attains the supreme perfection of freedom from the bondage of Karm by renouncing selfish attachment to the fruits of work. (18.49)

ज्ञान योग की परानिष्ठा
  बुद्ध्‌या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च। शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥
 विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस। ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥
 अहङकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्‌। विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
 विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हलका, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला,
 शब्दादि विषयों का त्याग करके एकांत और शुद्ध देश का सेवन करने वाला,
 सात्त्विक धारण शक्ति के  द्वारा अंतःकरण और इंद्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला,
 राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके भलीभाँति दृढ़ वैराग्य का आश्रय लेने वाला तथा 
अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरंतर ध्यान योग के परायण रहने वाला, 
ममतारहित और 
शांतियुक्त पुरुष सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में अभिन्नभाव से स्थित होने का पात्र होता है॥51-53॥
Endowed with purified intellect, 
subduing the mind with firm resolve,
 turning away from sound and other objects of the senses, 
giving up likes and dislikes; living in solitude; eating lightly;
 controlling the mind, speech, and organs of action; 
ever absorbed in yog of meditation;
 taking refuge in detachment; and 
relinquishing egotism, violence, pride, lust, anger, and proprietorship --- 

one becomes peaceful, free from the notion of "I” and “my", and fit for attaining oneness with the Supreme Being (ParBrahm). (18.51-53)

  ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्‌॥
 फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसी के लिए शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव वाला योगी मेरी पराभक्ति को प्राप्त हो जाता है॥54॥
( जो तत्त्व ज्ञान की पराकाष्ठा है तथा जिसको प्राप्त होकर और कुछ जानना बाकी नहीं रहता वही यहाँ पराभक्ति, ज्ञान की परानिष्ठा, परम नैष्कर्म्यसिद्धि और परमसिद्धि इत्यादि नामों से कही गई है) 
  भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्‌॥
 उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्व से जान लेता है तथा उस भक्ति से मुझको तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है॥55॥
 Absorbed in the Supreme Being (ParBrahm), the serene one neither grieves nor desires. Becoming impartial to all beings, one obtains My Paraa-Bhakti, the highest devotional love. (18.54) 
By devotion one truly understands what and who I am in essence. Having known Me in essence, one immediately merges with Me.  (18.55)

  सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्‌॥
 मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो संपूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है॥56॥
A KarmaYogi devotee attains Moksh, the eternal immutable abode, by My grace --- even while doing all duties --- just by taking refuge in Me (by surrendering all action to Me with loving devotion). (18.56)

  स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्‌ ॥
 हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा॥60॥
O Arjun, you are controlled by your own nature-born Karmic impressions (Samskaar). Therefore, you shall do --- even against your will --- what you do not wish to do out of delusion. (18.60)
  स्वभाव  = your own nature-born Karmic impressions (Samskaar)
 
   ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥
  हे अर्जुन! शरीर रूप यंत्र में आरूढ़ हुए संपूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है॥61॥
The Supreme Lord, abiding as the controller (Ishvar) in the causal heart (or the inner psyche) of all beings, O Arjun, causes them to act (or work out their Karm) like a puppet (of Karm) mounted on a machine. (18.61)

  तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌॥
 हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परमधाम को प्राप्त होगा॥62॥
(लज्जा, भय, मान, बड़ाई और आसक्ति को त्यागकर एवं शरीर और संसार में अहंता, ममता से रहित होकर एक परमात्मा को ही परम आश्रय, परम गति और सर्वस्व समझना तथा अनन्य भाव से अतिशय श्रद्धा, भक्ति और प्रेमपूर्वक निरंतर भगवान के नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूप का चिंतन करते रहना एवं भगवान का भजन, स्मरण करते हुए ही उनके आज्ञा अनुसार कर्तव्य कर्मों का निःस्वार्थ भाव से केवल परमेश्वर के लिए आचरण करना यह 'सब प्रकार से परमात्मा के ही शरण' होना है)
 Seek refuge in the Supreme Lord (Krishn or Ishvar) alone with loving devotion, O Arjun. By His grace you shall attain supreme peace and the Eternal Abode (ParamDhaam). (18.62)

   इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्‍गुह्यतरं मया । विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥
  इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया। अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञान को पूर्णतया भलीभाँति विचार कर, जैसे चाहता है वैसे ही कर॥63॥
Thus, I have explained the knowledge that is more secret than the secret. After fully reflecting on this, do as you wish. (18.63)

Krishna given us free will and respect it all the time  may be that why there is so much suffering in world.


   मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥
हे अर्जुन! तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है॥65॥
 Fix your mind on Me, be devoted to Me, offer service to Me, bow down to Me, and you shall certainly reach Me. I promise you because you are My very dear friend. (18.65)

   सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण ( में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर॥66॥
Setting aside all meritorious deeds (Dharm), just surrender completely to My will (with firm faith and loving contemplation). I shall liberate you from all sins (or the bonds of Karm). Do not grieve. (18.66)

गीता सार

Wednesday, March 12, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 17 श्रद्धात्रयविभागयोग

    त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु॥
  श्री भगवान्‌ बोले- मनुष्यों की वह शास्त्रीय संस्कारों से रहित केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी- ऐसे तीनों प्रकार की ही होती है। उसको तू मुझसे सुन॥2॥
 (अनन्त जन्मों में किए हुए कर्मों के सञ्चित संस्कार से उत्पन्न हुई श्रद्धा ''स्वभावजा'' श्रद्धा कही जाती है।)
   The natural faith of embodied beings is of three kinds: Goodness, passion, and ignorance (Saattvik, Raajasik, and Taamasik). Now hear about these from Me. (17.02)

     सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥
   हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है॥3॥
O Arjun, the faith of each is in accordance with one’s own natural disposition (governed by Karmic impressions). One is known by one’s faith. One can become whatever one wants to be (if one constantly contemplates on the object of desire with faith). (17.03)

  यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये जयन्ते तामसा जनाः॥
 सात्त्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं॥4॥
Persons in the mode of goodness worship celestial controllers (Devas); those in the mode of passion worship supernatural rulers and demons; and those in the mode of ignorance worship ghosts and spirits. (17.04)
like some ignorant muslims-sufis-hindus worships grave, sai baba .....

    अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः। दम्भाहङ्‍कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥
जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं॥5॥
      कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्‌यासुरनिश्चयान्‌॥
  जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को और अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं (शास्त्र से विरुद्ध उपवासादि घोर आचरणों द्वारा शरीर को सुखाना एवं भगवान्‌ के अंशस्वरूप जीवात्मा को क्लेश देना, भूत समुदाय को और अन्तर्यामी परमात्मा को ''कृश करना'' है।), उन अज्ञानियों को तू आसुर स्वभाव वाले जान॥6॥
Ignorant persons of demonic nature are those who practice severe austerities without following the prescription of the scriptures, who are full of hypocrisy and egotism, who are impelled by the force of desire and attachment, and who senselessly torture the elements in their body and also Me who dwells within the body. (17.05-06)
here Krishna emphasized on authority of scripture 

    आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
  भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है।
Three types of food
 The food preferred by all of us is also of three types.

   आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः। रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥
 आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय- ऐसे आहार अर्थात्‌ भोजन करने के पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं॥8॥
(जिस भोजन का सार शरीर में बहुत काल तक रहता है, उसको स्थिर रहने वाला कहते हैं।)
The foods that promote longevity, virtue, strength, health, happiness, and joy are juicy, smooth, substantial, and nutritious. Such foods are liked by persons in the mode of goodness. (17.08)

    कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः। आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥
 कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार अर्थात्‌ भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं॥9॥
People in the mode of passion like foods that are very bitter, sour, salty, hot, pungent, dry, and burning; and cause pain, grief, and disease. (17.09)

    यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्‌। उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्‌॥
  जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है॥10॥
People in the mode of ignorance like foods that are stale, tasteless, putrid, rotten, refuse, and impure (such as meat and alcohol). (17.10)

    देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्‌। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥
  देवता, ब्राह्मण, गुरु (यहाँ 'गुरु' शब्द से माता, पिता, आचार्य और वृद्ध एवं अपने से जो किसी प्रकार भी बड़े हों, उन सबको समझना चाहिए।) और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा- यह शरीर- सम्बन्धी तप कहा जाता है॥14॥
   Austerity of thought, word, and deed
   मनसा वाचा कर्मणा 

 The worship of celestial controllers (Devas), the priest, the guru, and the wise; purity, honesty, celibacy, and nonviolence --- these are said to be austerity of deed. (17.14)

     अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्‌। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्‍मयं तप उच्यते॥
  जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है (मन और इन्द्रियों द्वारा जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा ही कहने का नाम 'यथार्थ भाषण' है।) तथा जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है- वही वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है॥15॥
Speech that is non-offensive, truthful, pleasant, beneficial, and is used for the regular study of scriptures is called the austerity of word. (17.15)

   मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥
  मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण के भावों की भलीभाँति पवित्रता, इस प्रकार यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है॥16॥
Serenity of mind, gentleness, calmness, self-control, and purity of thought --- these are called austerity of thought. (17.16)

    श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः। अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥
 फल को न चाहने वाले योगी पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किए हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप को सात्त्विक कहते हैं॥17॥
The above mentioned threefold austerity (of thought, word, and deed), practiced by yogis with supreme faith, without a desire for the fruit, is said to be in the mode of goodness. (17.17)

   सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्‌। क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्‌॥
 जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए तथा अन्य किसी स्वार्थ के लिए भी स्वभाव से या पाखण्ड से किया जाता है, वह अनिश्चित ('अनिश्चित फलवाला' उसको कहते हैं कि जिसका फल होने न होने में शंका हो।) एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है॥18॥
Austerity that is performed for gaining respect, honor, reverence, and for the sake of show, yielding an uncertain and temporary result, is said to be in the mode of passion. (17.18)

    मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्‌॥
  जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है- वह तप तामस कहा गया है॥19॥
Austerity performed with foolish stubbornness or with self-torture or for harming others, is said to be in the mode of ignorance. (17.19)
  like muslims do in muhrram 

   दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्‌॥
दान देना ही कर्तव्य है- ऐसे भाव से जो दान देश तथा काल
(जिस देश-काल में जिस वस्तु का अभाव हो, वही देश-काल, उस वस्तु द्वारा प्राणियों की सेवा करने के लिए योग्य समझा जाता है।)
और पात्र के
(भूखे, अनाथ, दुःखी, रोगी और असमर्थ तथा भिक्षुक आदि तो अन्न, वस्त्र और ओषधि एवं जिस वस्तु का जिसके पास अभाव हो, उस वस्तु द्वारा सेवा करने के लिए योग्य पात्र समझे जाते हैं और श्रेष्ठ आचरणों वाले विद्वान्‌ ब्राह्मणजन धनादि सब प्रकार के पदार्थों द्वारा सेवा करने के लिए योग्य पात्र समझे जाते हैं।)
प्राप्त होने पर उपकार न करने वाले के प्रति दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है॥20॥
   Charity that is given at the right place and time as a matter of duty to a deserving candidate who does nothing in return, is considered to be in the mode of goodness. (17.20)

    यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्‌॥
  किन्तु जो दान क्लेशपूर्वक
 (जैसे प्रायः वर्तमान समय के चन्दे-चिट्ठे आदि में धन दिया जाता है।)
तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल को दृष्टि में
(अर्थात्‌ मान बड़ाई, प्रतिष्ठा और स्वर्गादि की प्राप्ति के लिए अथवा रोगादि की निवृत्ति के लिए।)
रखकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है॥21॥
Charity that is given unwillingly, or to get something in return, or to gain for some fruit, is said to be in the mode of passion. (17.21)

  अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते। असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥
 जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश-काल में और कुपात्र के प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है॥22॥
  Charity that is given at a wrong place and time to unworthy persons, or without paying respect to the receiver or with ridicule, is said to be in the mode of ignorance. (17.22)

     ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः। ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥
 ॐ, तत्‌, सत्‌-ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानन्दघन ब्रह्म का नाम कहा है, उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादि रचे गए॥23॥
"OM TAT SAT" is said to be the threefold name of the Eternal Being (Brahm). Persons with good (Braahmanic) qualities, the Vedas, and the selfless service (Seva, Yajn) were created by and from Brahm in the ancient time. (17.23

    तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः। प्रवर्तन्ते विधानोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम्‌॥
 इसलिए वेद-मन्त्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्र विधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा 'ॐ' इस परमात्मा के नाम को उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं॥24॥
  Therefore, acts of sacrifice, charity, and austerity prescribed in the scriptures are always commenced by uttering "OM" by the knowers of the Supreme Being (ParBrahm). (17.24)

   अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्‌। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥
 हे अर्जुन! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है- वह समस्त 'असत्‌'- इस प्रकार कहा जाता है, इसलिए वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के बाद ही॥28॥
Whatever is done without faith --- whether it is sacrifice, charity, austerity, or any other act --- is called "ASAT". It has no value here or hereafter, O Arjun. (17.28)




Tuesday, March 11, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 16 दैवासुरसम्पद्विभागयोग

     अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्‌॥
  श्री भगवान बोले- भय का सर्वथा अभाव,  अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता,  तत्त्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरन्तर दृढ़ स्थिति और सात्त्विक दान ,  इन्द्रियों का दमन,  भगवान,  देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान्‌ के नाम और गुणों का कीर्तन,  स्वधर्म पालन के लिए कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता॥1॥
 (परमात्मा के स्वरूप को तत्त्व से जानने के लिए सच्चिदानन्दघन परमात्मा के स्वरूप में एकी भाव से ध्यान की निरन्तर गाढ़ स्थिति का ही नाम 'ज्ञानयोगव्यवस्थिति' समझना चाहिए)
   अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्‌। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्‌॥
 मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना,  यथार्थ और प्रिय भाषण , अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना,  कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्याग,  अन्तःकरण की उपरति अर्थात्‌ चित्त की चञ्चलता का अभाव,  किसी की भी निन्दादि न करना,  सब भूतप्राणियों में हेतुरहित दया,  इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना,  कोमलता,  लोक और शास्त्र से विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव॥2॥
(अन्तःकरण और इन्द्रियों के द्वारा जैसा निश्चय किया हो, वैसे-का-वैसा ही प्रिय शब्दों में कहने का नाम 'सत्यभाषण' है)
   तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहोनातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
 तेज ,  क्षमा,  धैर्य,  बाहर की शुद्धि एवं किसी में भी शत्रुभाव का न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव- ये सब तो हे अर्जुन! दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं॥3॥
(श्रेष्ठ पुरुषों की उस शक्ति का नाम 'तेज' है कि जिसके प्रभाव से उनके सामने विषयासक्त और नीच प्रकृति वाले मनुष्य भी प्रायः अन्यायाचरण से रुककर उनके कथनानुसार श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं)

A list of major 26 divine qualities that should be cultivated for salvation

The Supreme Lord said:  Fearlessness,  purity of the inner psyche,  perseverance in the yog of Self-knowledge,  charity,  sense-restraint,  sacrifice,  study of the scriptures,  austerity,  honesty;  nonviolence, truthfulness,  absence of anger,  renunciation,  calmness,  abstinence from malicious talk,  compassion for all creatures,  freedom from greed,  gentleness,  modesty,  absence of fickleness,  splendor,  forgiveness, fortitude,  cleanliness,  absence of malice, and  absence of pride --- these are the (twenty-six) qualities of those endowed with divine virtues, O Arjun. (16.01-03)

   दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च। अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्‌॥
 हे पार्थ! दम्भ,  घमण्ड और अभिमान तथा  क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी- ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं॥4॥
O Arjun, the marks of those who are born with demonic qualities are: Hypocrisy, arrogance, pride, anger, harshness, and ignorance. (16.04)
    दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
दैवी सम्पदा मुक्ति के लिए और आसुरी सम्पदा बाँधने के लिए मानी गई है।
Divine qualities lead to salvation (Moksh); the demonic qualities are said to be for bondage.

 द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
इस लोक में भूतों की सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला।
There are only two types of human beings, the wise and the ignorant: The divine, and the demonic


 Suffering is the destiny of the ignorant
   त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌॥
  काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले अर्थात्‌ उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए॥21॥
   Lust, anger, and greed are the three gates to hell

   तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
 इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है॥24॥
 Therefore, let the scripture be your authority in determining what should be done and what should not be done. You should perform your duty following the scriptural injunction. (16.24)








Monday, February 17, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 10 विभूतियोग

  यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्‌ । असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
 जो मुझको अजन्मा अर्थात्‌ वास्तव में जन्मरहित, अनादि (अनादि उसको कहते हैं जो आदि रहित हो एवं सबका कारण हो) और लोकों का महान्‌ ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान्‌ पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है॥3॥
 One who knows Me as the unborn, the beginningless, and the Supreme Lord of the universe, is considered wise among the mortals and becomes liberated from the bondage of Karm. (10.03)

  बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥
 निश्चय करने की शक्ति, 
यथार्थ ज्ञान, 
असम्मूढ़ता, 
क्षमा, सत्य,
 इंद्रियों का वश में करना, 
मन का निग्रह तथा 
सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय
 तथा अहिंसा, समता, संतोष तप (स्वधर्म के आचरण से इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति- ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं॥4-5॥
Discrimination, Self-knowledge, non-delusion, forgiveness, truthfulness, control over the mind and senses, tranquillity, pleasure, pain, birth, death, fear, fearlessness, nonviolence, calmness, contentment, austerity, charity, fame, ill fame --- these diverse qualities in human beings arise from Me alone. (10.04-05)

 Genesis 
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा | मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥
  सात महर्षिजन, चार उनसे भी पूर्व में होने वाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु- ये मुझमें भाव वाले सब-के-सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसार में यह संपूर्ण प्रजा है॥6॥
    The seven great sages, four Sanakas, and fourteen Manus from whom all the creatures of the world were born, originated from My potential energy. (10.06)

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
मैं वासुदेव ही संपूर्ण जगत्‌ की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत्‌ चेष्टा करता है
I am the origin of all. Everything emanates from Me.

 satsang & its importance 
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्‌ । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
  निरंतर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले (मुझ वासुदेव के लिए ही जिन्होंने अपना जीवन अर्पण कर दिया है उनका नाम मद्गतप्राणाः है।) भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं॥9॥
Understanding this, the wise adore Me with love and devotion (10.08), remaining ever content and delighted. Their minds remain absorbed in Me and their lives surrendered unto Me. They always enlighten each other by talking about Me. (10.09)

    तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌ । ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥
  उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं॥10॥
I give knowledge and understanding of metaphysical science --- to those who are ever united with Me and lovingly adore Me --- by which they come to Me. (10.10)
   तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥
  हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंतःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ॥11॥
I, who dwell within their inner psyche as consciousness, destroy the darkness born of ignorance by the shining lamp of transcendental knowledge as an act of compassion for them. (10.11)

 अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥
  हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ॥20॥
O Arjun, I am the Spirit (Atma) abiding in the inner psyche of all beings. I am also the beginning, the middle, and the end of all beings. (10.20)
 मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ तथा मैं उनचास वायुदेवताओं का तेज और नक्षत्रों का अधिपति चंद्रमा हूँ॥21॥
मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और भूत प्राणियों की चेतना अर्थात्‌ जीवन-शक्ति हूँ॥22॥
 मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ। मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखरवाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ॥23॥
 पुरोहितों में मुखिया बृहस्पति मुझको जान। हे पार्थ! मैं सेनापतियों में स्कंद और जलाशयों में समुद्र हूँ॥24॥
 मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात्‌‌ ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ॥25॥
मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ॥26॥
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्धवम्‌ । एरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्‌ ॥
 घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न होने वाला उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत नामक हाथी और मनुष्यों में राजा मुझको जान॥27॥
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्‌ । प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥
  मैं शस्त्रों में वज्र और गौओं में कामधेनु हूँ। शास्त्रोक्त रीति से सन्तान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूँ और सर्पों में सर्पराज वासुकि हूँ॥28॥
Know Me as the celestial animals among the animals, and the King among men. I am the thunderbolt among weapons, and I am Cupid for procreation. (10.27-28)
        मैं नागों में (नाग और सर्प ये दो प्रकार की सर्पों की ही जाति है।) शेषनाग और जलचरों का अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरों में अर्यमा नामक पितर तथा शासन करने वालों में यमराज मैं हूँ॥29॥
मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों का समय (क्षण, घड़ी, दिन, पक्ष, मास आदि में जो समय है वह मैं हूँ) हूँ तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियों में गरुड़ हूँ॥30॥
 मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्री भागीरथी गंगाजी हूँ॥31॥
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्‌ ॥
 हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि और अंत तथा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या अर्थात्‌ ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करने वालों का तत्व-निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूँ॥32॥
I am the beginning, the middle, and the end of all creation, O Arjun. Among the knowledge I am knowledge of the supreme Self. I am logic of the logician. (10.32)

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥
 मैं अक्षरों में अकार हूँ और समासों में द्वंद्व नामक समास हूँ। अक्षयकाल अर्थात्‌ काल का भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला, विराट्स्वरूप, सबका धारण-पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ॥33॥
 I am the letter "A" among the alphabets. I am the dual compound among the compound words. I am the endless time. I am the sustainer of all, and have faces on all sides (or I am omniscient). (10.33)
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्‌ । कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥
  मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ तथा स्त्रियों में कीर्ति (कीर्ति आदि ये सात देवताओं की स्त्रियाँ और स्त्रीवाचक नाम वाले गुण भी प्रसिद्ध हैं, इसलिए दोनों प्रकार से ही भगवान की विभूतियाँ हैं), श्री, वाक्‌, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ॥34॥
 I am the all-devouring death and also the origin of future beings. I am the seven goddesses (Devis) or guardian angels presiding over the seven qualities --- fame, prosperity, speech, memory, intellect, resolve, and forgiveness. (10.34)

 तथा गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और छंदों में गायत्री छंद हूँ तथा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसंत मैं हूँ॥35॥
 मैं छल करने वालों में जूआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ। मैं जीतने वालों का विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हूँ॥36॥
I am gambling of the cheats, splendor of the splendid, victory of the victorious, resolution of the resolute, and goodness of the good. (10.36) 
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः । मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥
  वृष्णिवंशियों में (यादवों के अंतर्गत एक वृष्णि वंश भी था) वासुदेव अर्थात्‌ मैं स्वयं तेरा सखा, पाण्डवों में धनञ्जय अर्थात्‌ तू, मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ॥37॥
मैं दमन करने वालों का दंड अर्थात्‌ दमन करने की शक्ति हूँ, जीतने की इच्छावालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानों का तत्त्वज्ञान मैं ही हूँ॥38॥

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्‌ ॥
 और हे अर्जुन! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं ही हूँ, क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो॥39॥
I am the power of rulers, the statesmanship of the seekers of victory, I am silence among the secrets, and the Self-knowledge of the knowledgeable. (10.38) I am the origin or seed of all beings, O Arjun. There is nothing, animate or inanimate, that can exist without Me.

   यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्‌ ॥
  जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात्‌ ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उस को तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान॥41॥
The manifest creation is a very small fraction of the Absolute

There is no end of My divine manifestations, (10.40)
 Whatever is endowed with glory, brilliance, and power --- know that to be a manifestation of a very small fraction of My splendor. (10.41) 
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्‌ ॥
मैं इस संपूर्ण जगत्‌ को अपनी योगशक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ॥42॥

 O Arjun? I continually support the entire universe by a small fraction of My divine power (YogMaya). (10.42) 

Monday, February 10, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 9 राजविद्याराजगुह्ययोग

   अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥
 हे परंतप! इस उपयुक्त धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर मृत्युरूप संसार चक्र में भ्रमण करते
रहते हैं॥3॥
O Arjun, those who have no faith in this knowledge do not attain Me and follow the cycles of birth and death. (9.03)

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेषवस्थितः ॥
  मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत्‌ जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं, किंतु
वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ॥4॥
 This entire universe is an expansion of Mine. All beings depend on Me. I do not depend on them (because
I am the highest of all).  (9.04)

 न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्‌ । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥
वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं, किंतु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है॥5॥
Look at the power of My divine mystery; in reality, I --- the sustainer and creator of all beings --- do not depend on them, and they also do not depend on Me. (9.05)

    यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्‌ । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥
  जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरने वाला महान्‌ वायु सदा आकाश में ही स्थित है, वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से संपूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा जान॥6॥
Perceive that all beings remain in Me (without any contact or without producing any effect) as the mighty wind, moving everywhere, eternally remains in space. (9.06)

 सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्‌ । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्‌ ॥
हे अर्जुन! कल्पों के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात्‌ प्रकृति में लीन होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ॥7॥
  प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्‌ ॥
  अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतंत्र हुए इस संपूर्ण भूतसमुदाय को बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ॥8॥
All beings merge into My Aadi Prakriti (primary material Nature) at the end of a Kalp (or a cycle of 4.32 billion years),
O Arjun, and I create them again at the beginning of the next Kalp. (9.07)
 I create the entire multitude of beings again  and again with the help of My material Nature (Prakriti or Maya). These
 beings are under control of the modes (Gunas) of material Nature (Prakriti). (9.08)

   मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरं । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥
  हे अर्जुन! मुझ अधिष्ठाता के सकाश से प्रकृति चराचर सहित सर्वजगत को रचती है और इस हेतु से ही यह संसारचक्र घूम रहा है॥10॥
The divine kinetic energy (Maya) --- with the help of material Nature (Prakriti) --- creates all animate and inanimate objects under My supervision; thus, the creation keeps on going, O Arjun. (9.10)

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥
  वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरंतर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और मुझको बार-बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं॥14॥
Persons of firm resolve worship Me with ever steadfast devotion by always singing My glories, striving to attain Me, and prostrating before Me with devotion. (9.14)

      ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ते यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्।।
  दूसरे ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण-निराकार ब्रह्म का ज्ञानयज्ञ द्वारा अभिन्नभाव से पूजन करते हुए भी मेरी उपासना करते हैं और दूसरे मनुष्य बहुत प्रकार से स्थित मुझ विराट स्वरूप परमेश्वर की पृथक भाव से उपासना करते हैं।।15।।
 Some worship Me by acquiring and propagating Self-knowledge. Others worship the infinite as the One in all (or non-dual), as the master of all (or dual), and in various other ways. (9.15)

  भगवान के स्वरूप का वर्णन 
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्‌ । मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्‌ ॥
 क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषधि मैं हूँ, मंत्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं ही हूँ॥16॥
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ॥
 इस संपूर्ण जगत्‌ का धाता अर्थात्‌ धारण करने वाला एवं कर्मों के फल को देने वाला, पिता, माता, पितामह, जानने योग्य,  पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ॥17॥
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्‌ । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्‌॥
  प्राप्त होने योग्य परम धाम, भरण-पोषण करने वाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ का देखने वाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, प्रत्युपकार न चाहकर हित करने वाला, सबकी उत्पत्ति-प्रलय का हेतु, स्थिति का आधार, निधान (प्रलयकाल में संपूर्ण भूत सूक्ष्म रूप से जिसमें लय होते हैं उसका नाम 'निधान' है) और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ॥18॥
 I am the ritual, I am the sacrifice, I am the offering, I am the herb, I am the mantra, I am the clarified butter, I am the fire, and I am the oblation. (See also 4.24). I am the supporter of the universe, the father, the mother, and the grandfather. I am the object of knowledge, the sacred syllable “AUM”, and also the Rig, the Yajur, and the Saam Vedas. I am the goal, the supporter, the Lord, the witness, the abode, the refuge, the friend, the origin, the dissolution, the foundation, the substratum, and the immutable seed. (9.16-18)

  तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्‌णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥
 मैं ही सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा का आकर्षण करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ और सत्‌-असत्‌ भी मैं ही हूँ॥19॥
I give heat. I send, as well as withhold, the rain. I am immortality, as well as death. I am also both the absolute (Sat or Akshar) and the temporal (Asat or Kshar), O Arjun. (The Supreme Being has become everything. ) (9.19)

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्‍वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्‌ ॥
  तीनों वेदों में विधान किए हुए सकाम कर्मों को करने वाले, सोम रस को पीने वाले, पापरहित पुरुष (यहाँ स्वर्ग प्राप्ति के प्रतिबंधक देव ऋणरूप पाप से पवित्र होना समझना चाहिए) मुझको यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं, वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप स्वर्गलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं॥20॥
The doers of the rituals prescribed in the Vedas, the drinkers of the nectar of devotion, and whose sins are cleansed, worship Me by doing good deeds (Yajn) for gaining heaven. As a result of their meritorious deeds they go to heaven and enjoy celestial sense pleasures. (9.20)

   ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालंक्षीणे पुण्य मर्त्यलोकं विशन्ति। एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥
  वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्यु लोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार स्वर्ग के साधनरूप तीनों वेदों में कहे हुए सकामकर्म का आश्रय लेने वाले और भोगों की कामना वाले पुरुष बार-बार आवागमन को प्राप्त होते हैं, अर्थात्‌ पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग में जाते हैं और पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में आते हैं॥21॥
They return to the mortal world --- after enjoying the wide world of heavenly pleasures --- upon exhaustion of their good Karm (Punya). Thus following the injunctions of the three Vedas, persons working for the fruit of their actions take repeated birth and death.  (9.21)

         अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्‌ ॥
  जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्कामभाव से भजते हैं, उन नित्य-निरंतर मेरा चिंतन करने वाले पुरुषों का योगक्षेम (भगवत्‌स्वरूप की प्राप्ति का नाम 'योग' है और भगवत्‌प्राप्ति के निमित्त किए हुए साधन की रक्षा का नाम 'क्षेम' है) मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ॥22॥
I personally take care of both the spiritual and material welfare of those ever-steadfast devotees who always remember and adore Me with single-minded contemplation. (9.22)

  पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
 जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुणरूप से प्रकट होकर प्रीतिसहित खाता हूँ॥26॥
Whosoever offers Me a leaf, a flower, a fruit, or water with devotion, I accept and eat the offering of devotion by the pure-hearted. (9.26)
   समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्‌ ॥
  मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है, परंतु जो भक्त मुझको प्रेम से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट  हूँ॥29॥
The Self is present equally in all beings. There is no one hateful or dear to Me. But, those who worship Me with love and devotion are very close to Me, and I am also very close to them.  (9.29)

 हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता॥
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
Be aware, O Arjun, that My devotee shall never perish or fall down

Tuesday, February 4, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 8 अक्षरब्रह्मयोग

           अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥
  श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर 'ब्रह्म' है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा 'अध्यात्म' नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह 'कर्म' नाम से कहा गया है॥3॥
  The immutable Atma  is called Brahm (Eternal Being).
  The nature (including the inherent power of cognition and desire) of Brahm is called Adhyaatm.
   The creative power of Brahm that causes manifestation of the living entity (Jeev-srusti ) is called Karm

       अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌ । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥
  उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष (जिसको शास्त्रों में सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ, प्रजापति, ब्रह्मा इत्यादि नामों से कहा गया है) अधिदैव है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! इस शरीर में मैं वासुदेव ही अन्तर्यामी रूप से अधियज्ञ हूँ॥4॥
  Mortal beings are called Adhibhut.
  The expansions of Divine Personality ---such as Naaraayan, Mahaa-vishnu, Ishvar, etc. --- are called Divine Beings (Adhidaiv).
   I am the Supersoul (Adhiyajn) residing inside the body as the supreme controller (Ishvar), O Arjun. (8.04)

        आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥
 हे अर्जुन! ब्रह्मलोकपर्यंत सब लोक पुनरावर्ती हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादि के लोक काल द्वारा सीमित होने से अनित्य हैं॥16॥
The dwellers of all the worlds --- up to and including the world of Brahmaa, the creator --- are subject to the miseries of repeated birth and death. But, after attaining Me, O Arjun, one does not take birth again. (See also 9.25) (8.16)
Worshippers of the deities go to the deities; worshippers of ancestors go to the ancestors, and worshippers of the ghosts go to the ghosts; but My devotees come to Me (and are not born again).  (9.25)

 A simple method of God-realization   
    तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्‌ ॥
  इसलिए हे अर्जुन! तू सब समय में निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। इस प्रकार मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धि से युक्त होकर तू निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा॥7॥
Therefore, always remember Me and do your duty. You shall certainly attain Me if your mind and intellect are ever focused on Me. (8.07)

    अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना । परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्‌ ॥
  हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यास रूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाश रूप दिव्य पुरुष को अर्थात परमेश्वर को ही प्राप्त होता है॥8॥
By contemplating on Me with an unwavering mind that is disciplined by the practice of meditation, one attains the Supreme Being, O Arjun. (8.08)

       कविं पुराणमनुशासितार-मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
       सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्‌ ॥
 जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियंता (अंतर्यामी रूप से सब प्राणियों के शुभ और अशुभ कर्म के अनुसार शासन करने वाला) सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म ( विराट  से भी विराट ), सबके धारण-पोषण करने वाले अचिन्त्य-स्वरूप, सूर्य के सदृश नित्य चेतन प्रकाश रूप और अविद्या से अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वर का स्मरण करता है॥9॥
       प्रयाण काले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
      भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्‌- स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्‌ ।
  वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है॥10॥
One who meditates on the Supreme Being (ParBrahm)--- as the omniscient, the oldest, the controller, smaller than the smallest (and bigger than the biggest), the sustainer of everything, the inconceivable, the self-luminous like the sun, and as transcendental or beyond the material reality --- at the time of death with steadfast mind and devotion; making the flow of bio-impulses (life forces, Praan) rise up to the middle of two eye brows (or the sixth Chakr) by the power of yog and holding there; attains Krishn, the Supreme Divine Person (8.09-10)
Attain salvation by meditating on God 
    अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनीः ॥
  हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्य-चित्त होकर सदा ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य-निरंतर मुझमें युक्त हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूँ, अर्थात उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥14॥
 I am easily attainable, O Arjun, by that ever steadfast yogi who always thinks of Me and whose mind does not go elsewhere. (8.14)
    मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्‌ । नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥
  परम सिद्धि को प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखों के घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते॥15॥
After attaining Me, the great souls do not incur rebirth in this miserable transitory world, because they have attained the highest perfection. (8.15)

       आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥
  हे अर्जुन! ब्रह्मलोकपर्यंत सब लोक पुनरावर्ती हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादि के लोक काल द्वारा सीमित होने से अनित्य हैं॥16॥
The dwellers of all the worlds --- up to and including the world of Brahmaa, the creator --- are subject to the miseries of repeated birth and death  as those lok   are created for  limited time period  . But, after attaining Me, O Arjun, one does not take birth again.  (8.16)

    अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्‌ । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥
  जो अव्यक्त 'अक्षर' इस नाम से कहा गया है, उसी अक्षर नामक अव्यक्त भाव को परमगति कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्त भाव को प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते, वह मेरा परम धाम है॥21॥
    पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्‌ ॥
  हे पार्थ! जिस परमात्मा के अंतर्गत सर्वभूत है और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मा से यह समस्त जगत परिपूर्ण है, वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य है ॥22॥
There is another eternal transcendental existence--- higher than the changeable material Nature (Prakriti) --- that does not perish when all created beings perish. This is called the unmanifest Eternal Being (Avyakt Akshar Brahm). This is also said to be ParamDhaam, the supreme abode. Those who attain My supreme abode do not take birth again. (8.20-21)
 This supreme abode, O Arjun, is attainable by unswerving devotion to Me within which all beings exist, and by which all this universe is pervaded. ((8.22)

Two basic paths of departure from the world
अर्चिमार्ग और धूममार्ग
   अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥
 अर्चिमार्ग- जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता हैं, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। ॥24॥
       धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण षण्मासा दक्षिणायनम्‌ । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥
 धूममार्ग- जिस मार्ग में धूमाभिमानी देवता है, रात्रि अभिमानी देवता है तथा कृष्ण पक्ष का अभिमानी देवता है और दक्षिणायन के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गया हुआ सकाम कर्म करने वाला योगी उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले गया हुआ चंद्रमा की ज्योत को प्राप्त होकर स्वर्ग में अपने शुभ कर्मों का फल भोगकर वापस आता है॥25॥
Fire, light, daytime, the bright lunar fortnight, and the six months of the northern solstice of the sun --- departing by the path of these celestial controllers (Devas), yogis who know the Eternal Being (Brahm) attain Brahm. (8.24) 
Smoke, night, the dark lunar fortnight, and the six months of southern solstice of the sun --- departing by these paths, the righteous person attains heaven and comes back to earth. (8.25)


   शुक्ल कृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुनः ॥
  क्योंकि जगत के ये दो प्रकार के- शुक्ल और कृष्ण अर्थात देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गए हैं। इनमें एक द्वारा गया हुआ (अर्थात  अर्चिमार्ग से गया हुआ योगी।)-- जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता, उस परमगति को प्राप्त होता है और दूसरे के द्वारा गया हुआ ( अर्थात धूममार्ग से गया हुआ सकाम कर्मयोगी।) फिर वापस आता है अर्थात्‌ जन्म-मृत्यु को प्राप्त होता है॥26॥
The path of light (of spiritual practice and Self-knowledge) and the path of darkness (of materialism and ignorance) are thought to be the world’s two eternal paths. The former leads to salvation (Moksh ,Mukti, Nirvan) and the latter leads to rebirth. (8.26)

      वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्‌ ।
       अत्येत तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्‌ ॥
  योगी पुरुष इस रहस्य को तत्त्व से जानकर वेदों के पढ़ने में तथा यज्ञ, तप और दानादि के करने में जो पुण्यफल कहा है, उन सबको निःसंदेह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परम पद को प्राप्त होता है॥28॥
  The yogi who knows all this goes beyond getting the benefits of the study of the Vedas, performance of sacrifices, austerities, and charities, and attains My Supreme Eternal Abode (ParamDhaam). (8.28) 

Monday, February 3, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 7 ज्ञानविज्ञानयोग

  मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः ॥
 हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है॥3॥
  Scarcely one out of thousands of persons strives for perfection of Self-realization. Scarcely one among those successful strivers truly understands Me. (7.03)

    भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहङ्‍कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥
     अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्‌ । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्‌ ॥
  पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भी- इस प्रकार ये आठ प्रकार से विभाजित मेरी प्रकृति है। यह आठ प्रकार के भेदों वाली तो अपरा अर्थात मेरी जड़ प्रकृति है और हे महाबाहो! इससे दूसरी को, जिससे यह सम्पूर्ण जगत धारण किया जाता है, मेरी जीवरूपा परा अर्थात चेतन प्रकृति जान॥4-5॥
   The mind, intellect, ego, ether[space], air, fire, water, and earth are the eightfold transformation (or division) of My material energy (Prakriti).
   The material energy is My lower Nature (Aparaa-shakti, Prakriti, matter). Know My other higher Nature (Paraa-shakti, Cetanaa, Purush, Spirit) by which this entire universe is sustained, O Arjun. (7.05)

  एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥
   हे अर्जुन! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पन्न होने वाले हैं और मैं सम्पूर्ण जगत का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात्‌ सम्पूर्ण जगत का मूल कारण हूँ॥6॥
Know that all creatures have evolved from this twofold energy; and I --- the Supreme Being (ParBrahm, Krishn) --- am the source of origin as well as dissolution of the entire universe.  (7.06)

    मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥
  हे धनंजय! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत सूत्र में सूत्र के मणियों के सदृश मुझमें गुँथा हुआ है॥7॥
There is nothing higher than Me, O Arjun. Everything in the universe is strung on Me, the Supreme Being (ParBrahm Paramaatma), like jewels are strung on the thread (of a necklace). (7.07)

   रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥
  हे अर्जुन! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ॥8॥
O Arjun, I am the sapidity in the water, I am the radiance in the sun and the moon, the sacred syllable AUM in all the Vedas, the sound in the ether, and potency in human beings.7. 08

     पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥
  मैं पृथ्वी में पवित्र (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध से इस प्रसंग में इनके कारण रूप तन्मात्राओं का ग्रहण है, इस बात को स्पष्ट करने के लिए उनके साथ पवित्र शब्द जोड़ा गया है।) गंध और अग्नि में तेज हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ॥9॥
I am the sweet fragrance in the earth. I am the heat in the fire, the life in all living beings, and the austerity in the ascetics. (7.09)

     बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्‌ । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌ ॥
  हे अर्जुन! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज मुझको ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ॥10॥
O Arjun, know Me to be the eternal seed of all creatures. I am the intelligence of the intelligent, and the brilliance of the brilliant.7 . 10

     बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्‌ । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥
  हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल अर्थात सामर्थ्य हूँ और सब भूतों में धर्म के अनुकूल अर्थात शास्त्र के अनुकूल काम हूँ॥11॥
I am the strength of the strong who is devoid of lust and selfish attachment. I am lust (Kaamadev, Cupid) in human beings that is in accord with righteousness (Dharm) (for the sacred and sole purpose of procreation after marriage), O Arjun. (7.-11)
Everything is a manifestation of the Absolute
I am the ritual, I am the sacrifice, I am the offering, I am the herb, I am the mantra, I am the clarified butter, I am the fire, and I am the oblation. (See also 4.24). I am the supporter of the universe, the father, the mother, and the grandfather. I am the object of knowledge, the sacred syllable “AUM”, and also the Rig, the Yajur, and the Saam Vedas. I am the goal, the supporter, the Lord, the witness, the abode, the refuge, the friend, the origin, the dissolution, the foundation, the substratum, and the immutable seed. (See also 7.10 and 10.39) (9.16-18)Brahm, the eternal Being, shall be realized by the one who considers everything as a manifestation or an act of Brahm. (Also see 9.16) (4.24) This entire universe is an expansion of Mine. All beings depend on Me. I do not depend on them (because I am the highest of all). (See also 7.12) (9.04) Look at the power of My divine mystery; in reality, I --- the sustainer and creator of all beings --- do not depend on them, and they also do not depend on Me. (9.05) (Like a gold chain depends on gold, and the milk products depend on milk. In fact, the gold chain does not depend on gold; the chain is nothing but gold. Similarly, matter and energy are different as well as non-different)I am the origin or seed of all beings, O Arjun. There is nothing, animate or inanimate, that can exist without Me. (See also 7.10 and 9.18) (10.39)

     ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥
  और भी जो सत्त्व गुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं और जो रजो गुण से होने वाले भाव हैं, उन सबको तू 'मुझसे ही होने वाले हैं' ऐसा जान, परन्तु वास्तव में  उनमें मैं और वे मुझमें नहीं हैं॥12॥
Know that three modes (Gunas) of material Nature --- goodness, passion, and ignorance --- also emanate from Me. I am not dependent on, or affected by the Gunas, but the Gunas are dependent on Me. (See also 9.04 and 9.05) (7.12)

   त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्‌ । मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्‌ ॥
 गुणों के कार्य रूप सात्त्विक, राजस और तामस- इन तीनों प्रकार के भावों से यह सारा संसार- प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा है, इसीलिए इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता॥13॥
 Human beings are deluded by the various aspects of these three modes (Gunas) of material Nature; therefore, they do not know Me who is eternal and above these Gunas. (7.13) 

    दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥
  क्योंकि यह अलौकिक अर्थात अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है, परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरंतर भजते हैं, वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात्‌ संसार से तर जाते हैं॥14॥

 This divine power (Maya) of Mine, consisting of three states (Gunas) of mind, is very difficult to overcome. Only those who surrender unto Me easily cross over this Maya.  (7.14)

One who offers service to Me with love and unswerving devotion transcends the three modes of material Nature and becomes fit for BrahmNirvan  (14.26)

         चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥
  हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करने वाले अर्थार्थी (सांसारिक पदार्थों के लिए भजने वाला),
आर्त (संकटनिवारण के लिए भजने वाला)
जिज्ञासु (मेरे को यथार्थ रूप से जानने की इच्छा से भजने वाला) और
ज्ञानी- ऐसे चार प्रकार के भक्तजन मुझको भजते हैं॥16॥
         Four types of virtuous ones worship or seek Me, O Arjun. They are:
The distressed,
the seeker of Self-knowledge,
 the seeker of wealth, and
the enlightened one who has experienced the Supreme. (7.16)

        तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
   उनमें नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेमभक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है
    Among them the enlightened devotee (Jnaani-bhakt), who is ever united with Me and whose devotion is single-minded, is the best.

     बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥
  बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्व ज्ञान को प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही हैं- इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है॥19॥
  After many births the enlightened one resorts to Me by realizing that everything is, indeed, My (or Supreme Being’s) manifestation. Such a great soul is very rare. (7.19)
Secularism of Gita
    यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्‌ ॥
  जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ॥21॥
Whosoever desires to worship whatever deity (using any name, form, and method) with faith, I make their faith steady in that very deity 7.21

   स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्‌ ॥
  वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए उन इच्छित भोगों को निःसंदेह प्राप्त करता है॥22॥
Endowed with steady faith they worship that deity, and obtain their wishes through that deity. Those wishes are, indeed, granted only by Me. (7.22
अपनी योगमाया से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता