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Monday, February 17, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 10 विभूतियोग

  यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्‌ । असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
 जो मुझको अजन्मा अर्थात्‌ वास्तव में जन्मरहित, अनादि (अनादि उसको कहते हैं जो आदि रहित हो एवं सबका कारण हो) और लोकों का महान्‌ ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान्‌ पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है॥3॥
 One who knows Me as the unborn, the beginningless, and the Supreme Lord of the universe, is considered wise among the mortals and becomes liberated from the bondage of Karm. (10.03)

  बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥
 निश्चय करने की शक्ति, 
यथार्थ ज्ञान, 
असम्मूढ़ता, 
क्षमा, सत्य,
 इंद्रियों का वश में करना, 
मन का निग्रह तथा 
सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय
 तथा अहिंसा, समता, संतोष तप (स्वधर्म के आचरण से इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति- ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं॥4-5॥
Discrimination, Self-knowledge, non-delusion, forgiveness, truthfulness, control over the mind and senses, tranquillity, pleasure, pain, birth, death, fear, fearlessness, nonviolence, calmness, contentment, austerity, charity, fame, ill fame --- these diverse qualities in human beings arise from Me alone. (10.04-05)

 Genesis 
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा | मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥
  सात महर्षिजन, चार उनसे भी पूर्व में होने वाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु- ये मुझमें भाव वाले सब-के-सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसार में यह संपूर्ण प्रजा है॥6॥
    The seven great sages, four Sanakas, and fourteen Manus from whom all the creatures of the world were born, originated from My potential energy. (10.06)

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
मैं वासुदेव ही संपूर्ण जगत्‌ की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत्‌ चेष्टा करता है
I am the origin of all. Everything emanates from Me.

 satsang & its importance 
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्‌ । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
  निरंतर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले (मुझ वासुदेव के लिए ही जिन्होंने अपना जीवन अर्पण कर दिया है उनका नाम मद्गतप्राणाः है।) भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं॥9॥
Understanding this, the wise adore Me with love and devotion (10.08), remaining ever content and delighted. Their minds remain absorbed in Me and their lives surrendered unto Me. They always enlighten each other by talking about Me. (10.09)

    तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌ । ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥
  उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं॥10॥
I give knowledge and understanding of metaphysical science --- to those who are ever united with Me and lovingly adore Me --- by which they come to Me. (10.10)
   तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥
  हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंतःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ॥11॥
I, who dwell within their inner psyche as consciousness, destroy the darkness born of ignorance by the shining lamp of transcendental knowledge as an act of compassion for them. (10.11)

 अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥
  हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ॥20॥
O Arjun, I am the Spirit (Atma) abiding in the inner psyche of all beings. I am also the beginning, the middle, and the end of all beings. (10.20)
 मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ तथा मैं उनचास वायुदेवताओं का तेज और नक्षत्रों का अधिपति चंद्रमा हूँ॥21॥
मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और भूत प्राणियों की चेतना अर्थात्‌ जीवन-शक्ति हूँ॥22॥
 मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ। मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखरवाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ॥23॥
 पुरोहितों में मुखिया बृहस्पति मुझको जान। हे पार्थ! मैं सेनापतियों में स्कंद और जलाशयों में समुद्र हूँ॥24॥
 मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात्‌‌ ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ॥25॥
मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ॥26॥
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्धवम्‌ । एरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्‌ ॥
 घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न होने वाला उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत नामक हाथी और मनुष्यों में राजा मुझको जान॥27॥
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्‌ । प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥
  मैं शस्त्रों में वज्र और गौओं में कामधेनु हूँ। शास्त्रोक्त रीति से सन्तान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूँ और सर्पों में सर्पराज वासुकि हूँ॥28॥
Know Me as the celestial animals among the animals, and the King among men. I am the thunderbolt among weapons, and I am Cupid for procreation. (10.27-28)
        मैं नागों में (नाग और सर्प ये दो प्रकार की सर्पों की ही जाति है।) शेषनाग और जलचरों का अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरों में अर्यमा नामक पितर तथा शासन करने वालों में यमराज मैं हूँ॥29॥
मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों का समय (क्षण, घड़ी, दिन, पक्ष, मास आदि में जो समय है वह मैं हूँ) हूँ तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियों में गरुड़ हूँ॥30॥
 मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्री भागीरथी गंगाजी हूँ॥31॥
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्‌ ॥
 हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि और अंत तथा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या अर्थात्‌ ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करने वालों का तत्व-निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूँ॥32॥
I am the beginning, the middle, and the end of all creation, O Arjun. Among the knowledge I am knowledge of the supreme Self. I am logic of the logician. (10.32)

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥
 मैं अक्षरों में अकार हूँ और समासों में द्वंद्व नामक समास हूँ। अक्षयकाल अर्थात्‌ काल का भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला, विराट्स्वरूप, सबका धारण-पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ॥33॥
 I am the letter "A" among the alphabets. I am the dual compound among the compound words. I am the endless time. I am the sustainer of all, and have faces on all sides (or I am omniscient). (10.33)
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्‌ । कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥
  मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ तथा स्त्रियों में कीर्ति (कीर्ति आदि ये सात देवताओं की स्त्रियाँ और स्त्रीवाचक नाम वाले गुण भी प्रसिद्ध हैं, इसलिए दोनों प्रकार से ही भगवान की विभूतियाँ हैं), श्री, वाक्‌, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ॥34॥
 I am the all-devouring death and also the origin of future beings. I am the seven goddesses (Devis) or guardian angels presiding over the seven qualities --- fame, prosperity, speech, memory, intellect, resolve, and forgiveness. (10.34)

 तथा गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और छंदों में गायत्री छंद हूँ तथा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसंत मैं हूँ॥35॥
 मैं छल करने वालों में जूआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ। मैं जीतने वालों का विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हूँ॥36॥
I am gambling of the cheats, splendor of the splendid, victory of the victorious, resolution of the resolute, and goodness of the good. (10.36) 
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः । मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥
  वृष्णिवंशियों में (यादवों के अंतर्गत एक वृष्णि वंश भी था) वासुदेव अर्थात्‌ मैं स्वयं तेरा सखा, पाण्डवों में धनञ्जय अर्थात्‌ तू, मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ॥37॥
मैं दमन करने वालों का दंड अर्थात्‌ दमन करने की शक्ति हूँ, जीतने की इच्छावालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानों का तत्त्वज्ञान मैं ही हूँ॥38॥

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्‌ ॥
 और हे अर्जुन! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं ही हूँ, क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो॥39॥
I am the power of rulers, the statesmanship of the seekers of victory, I am silence among the secrets, and the Self-knowledge of the knowledgeable. (10.38) I am the origin or seed of all beings, O Arjun. There is nothing, animate or inanimate, that can exist without Me.

   यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्‌ ॥
  जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात्‌ ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उस को तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान॥41॥
The manifest creation is a very small fraction of the Absolute

There is no end of My divine manifestations, (10.40)
 Whatever is endowed with glory, brilliance, and power --- know that to be a manifestation of a very small fraction of My splendor. (10.41) 
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्‌ ॥
मैं इस संपूर्ण जगत्‌ को अपनी योगशक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ॥42॥

 O Arjun? I continually support the entire universe by a small fraction of My divine power (YogMaya). (10.42) 

Monday, February 10, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 9 राजविद्याराजगुह्ययोग

   अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥
 हे परंतप! इस उपयुक्त धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर मृत्युरूप संसार चक्र में भ्रमण करते
रहते हैं॥3॥
O Arjun, those who have no faith in this knowledge do not attain Me and follow the cycles of birth and death. (9.03)

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेषवस्थितः ॥
  मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत्‌ जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं, किंतु
वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ॥4॥
 This entire universe is an expansion of Mine. All beings depend on Me. I do not depend on them (because
I am the highest of all).  (9.04)

 न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्‌ । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥
वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं, किंतु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है॥5॥
Look at the power of My divine mystery; in reality, I --- the sustainer and creator of all beings --- do not depend on them, and they also do not depend on Me. (9.05)

    यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्‌ । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥
  जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरने वाला महान्‌ वायु सदा आकाश में ही स्थित है, वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से संपूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा जान॥6॥
Perceive that all beings remain in Me (without any contact or without producing any effect) as the mighty wind, moving everywhere, eternally remains in space. (9.06)

 सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्‌ । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्‌ ॥
हे अर्जुन! कल्पों के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात्‌ प्रकृति में लीन होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ॥7॥
  प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्‌ ॥
  अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतंत्र हुए इस संपूर्ण भूतसमुदाय को बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ॥8॥
All beings merge into My Aadi Prakriti (primary material Nature) at the end of a Kalp (or a cycle of 4.32 billion years),
O Arjun, and I create them again at the beginning of the next Kalp. (9.07)
 I create the entire multitude of beings again  and again with the help of My material Nature (Prakriti or Maya). These
 beings are under control of the modes (Gunas) of material Nature (Prakriti). (9.08)

   मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरं । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥
  हे अर्जुन! मुझ अधिष्ठाता के सकाश से प्रकृति चराचर सहित सर्वजगत को रचती है और इस हेतु से ही यह संसारचक्र घूम रहा है॥10॥
The divine kinetic energy (Maya) --- with the help of material Nature (Prakriti) --- creates all animate and inanimate objects under My supervision; thus, the creation keeps on going, O Arjun. (9.10)

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥
  वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरंतर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और मुझको बार-बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं॥14॥
Persons of firm resolve worship Me with ever steadfast devotion by always singing My glories, striving to attain Me, and prostrating before Me with devotion. (9.14)

      ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ते यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्।।
  दूसरे ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण-निराकार ब्रह्म का ज्ञानयज्ञ द्वारा अभिन्नभाव से पूजन करते हुए भी मेरी उपासना करते हैं और दूसरे मनुष्य बहुत प्रकार से स्थित मुझ विराट स्वरूप परमेश्वर की पृथक भाव से उपासना करते हैं।।15।।
 Some worship Me by acquiring and propagating Self-knowledge. Others worship the infinite as the One in all (or non-dual), as the master of all (or dual), and in various other ways. (9.15)

  भगवान के स्वरूप का वर्णन 
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्‌ । मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्‌ ॥
 क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषधि मैं हूँ, मंत्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं ही हूँ॥16॥
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ॥
 इस संपूर्ण जगत्‌ का धाता अर्थात्‌ धारण करने वाला एवं कर्मों के फल को देने वाला, पिता, माता, पितामह, जानने योग्य,  पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ॥17॥
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्‌ । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्‌॥
  प्राप्त होने योग्य परम धाम, भरण-पोषण करने वाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ का देखने वाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, प्रत्युपकार न चाहकर हित करने वाला, सबकी उत्पत्ति-प्रलय का हेतु, स्थिति का आधार, निधान (प्रलयकाल में संपूर्ण भूत सूक्ष्म रूप से जिसमें लय होते हैं उसका नाम 'निधान' है) और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ॥18॥
 I am the ritual, I am the sacrifice, I am the offering, I am the herb, I am the mantra, I am the clarified butter, I am the fire, and I am the oblation. (See also 4.24). I am the supporter of the universe, the father, the mother, and the grandfather. I am the object of knowledge, the sacred syllable “AUM”, and also the Rig, the Yajur, and the Saam Vedas. I am the goal, the supporter, the Lord, the witness, the abode, the refuge, the friend, the origin, the dissolution, the foundation, the substratum, and the immutable seed. (9.16-18)

  तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्‌णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥
 मैं ही सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा का आकर्षण करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ और सत्‌-असत्‌ भी मैं ही हूँ॥19॥
I give heat. I send, as well as withhold, the rain. I am immortality, as well as death. I am also both the absolute (Sat or Akshar) and the temporal (Asat or Kshar), O Arjun. (The Supreme Being has become everything. ) (9.19)

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्‍वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्‌ ॥
  तीनों वेदों में विधान किए हुए सकाम कर्मों को करने वाले, सोम रस को पीने वाले, पापरहित पुरुष (यहाँ स्वर्ग प्राप्ति के प्रतिबंधक देव ऋणरूप पाप से पवित्र होना समझना चाहिए) मुझको यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं, वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप स्वर्गलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं॥20॥
The doers of the rituals prescribed in the Vedas, the drinkers of the nectar of devotion, and whose sins are cleansed, worship Me by doing good deeds (Yajn) for gaining heaven. As a result of their meritorious deeds they go to heaven and enjoy celestial sense pleasures. (9.20)

   ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालंक्षीणे पुण्य मर्त्यलोकं विशन्ति। एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥
  वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्यु लोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार स्वर्ग के साधनरूप तीनों वेदों में कहे हुए सकामकर्म का आश्रय लेने वाले और भोगों की कामना वाले पुरुष बार-बार आवागमन को प्राप्त होते हैं, अर्थात्‌ पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग में जाते हैं और पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में आते हैं॥21॥
They return to the mortal world --- after enjoying the wide world of heavenly pleasures --- upon exhaustion of their good Karm (Punya). Thus following the injunctions of the three Vedas, persons working for the fruit of their actions take repeated birth and death.  (9.21)

         अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्‌ ॥
  जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्कामभाव से भजते हैं, उन नित्य-निरंतर मेरा चिंतन करने वाले पुरुषों का योगक्षेम (भगवत्‌स्वरूप की प्राप्ति का नाम 'योग' है और भगवत्‌प्राप्ति के निमित्त किए हुए साधन की रक्षा का नाम 'क्षेम' है) मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ॥22॥
I personally take care of both the spiritual and material welfare of those ever-steadfast devotees who always remember and adore Me with single-minded contemplation. (9.22)

  पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
 जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुणरूप से प्रकट होकर प्रीतिसहित खाता हूँ॥26॥
Whosoever offers Me a leaf, a flower, a fruit, or water with devotion, I accept and eat the offering of devotion by the pure-hearted. (9.26)
   समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्‌ ॥
  मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है, परंतु जो भक्त मुझको प्रेम से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट  हूँ॥29॥
The Self is present equally in all beings. There is no one hateful or dear to Me. But, those who worship Me with love and devotion are very close to Me, and I am also very close to them.  (9.29)

 हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता॥
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
Be aware, O Arjun, that My devotee shall never perish or fall down

Tuesday, January 21, 2014

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ‍गीता-सार Gita in nutshell अध्याय 2. सांख्ययोग

    क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।  क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥२-३॥

  इसलिए हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती।
हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा ॥२-3॥

Do not become a coward, O Arjun, because it does not befit you.
Shake off this trivial weakness of your heart and get up for the battle, O Arjun. (2.03)

 न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌ ॥2-12॥



 न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे
और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे॥2-12॥

There was never a time when these monarchs, you, or I did not exist,
nor shall we ever cease to exist in the future. (2.12)

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥२-13॥
 जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही
अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।२-13॥

Just as the living entity (Atma, Jeev, Jeevaatma) acquires a childhood body, a youth body,
and an old age body during this life; similarly, it acquires another body after death.
The wise are not deluded by this.

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥२-14॥

  हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग
तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर॥२-14॥

The contacts of the senses with the sense objects give rise to the feelings of heat and cold, and
pain and pleasure. They are transitory and impermanent. Therefore, learn to endure them, O Arjun, (2.14)

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥२-15॥

  क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और
विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है॥२-15॥

because a calm person --- who is not afflicted by these sense objects, and is steady in pain and
pleasure --- becomes fit for immortality, O Arjun. (2.15)

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥२-22॥

   जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा
पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है॥२-22॥

Just as a person puts on new garments after discarding the old ones; similarly, the living entity (Spirit,
Atma, Jeev, Jeevaatma) acquires new bodies after casting away the old bodies. (2.22)

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥2-23||
  इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला
सकता और वायु नहीं सुखा सकता॥2-23॥

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥2-24||

  क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और निःसंदेह अशोष्य है तथा यह
आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है॥2-24॥

Weapons do not cut this Spirit (Atma), fire does not burn it, water does not make it wet, and the
 wind does not make it dry. Atma cannot be cut, burned, wet, or dried. It is eternal, all-pervading, unchanging, immovable, and  primeval. (2.23-24)

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥2-28||
  हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले
हैं, केवल बीच में ही प्रकट हैं, फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है?॥2-28॥


All beings, O Arjun, are unmanifest --- invisible to our physical eyes --- before birth and after death. They manifest between
 the birth and the death only. What is there to grieve about? (2.28)

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥2-47||

 तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो
तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो॥2-47॥


You have control (Adhikaar) over your respective duty only, but no control or claim over the results. The fruits  of work should not be your motive. You should never be inactive. (2.47)


योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय ।सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥2-48||हे धनंजय! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर, समत्व (जो कुछ भी कर्म किया जाए, उसके पूर्ण होने और न होने में तथा उसके फल में समभाव रहने का नाम 'समत्व' है।) ही योग कहलाता है॥2-48॥


Do your duty to the best of your ability
, O Arjun, with your mind attached to the Lord, abandoning worry and selfish attachment to the results, and remaining calm in both success and failure. The calmness of the mind is called KarmaYog. (2.48)

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌ ॥२-५०॥

समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है। इससे
तू समत्व रूप योग में लग जा, यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंध से छूटने का
उपाय है॥50॥

A KarmaYogi becomes free from both vice and virtue in this life itself. Therefore, strive for KarmaYog. Working to the best of one’s abilities without becoming attached to the fruits of work is called KarmaYog. (2.50)


दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । 
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥2-56||
  दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है॥५६॥
A person whose mind is unperturbed by sorrow, who does not crave pleasures, and who is completely free from attachment, fear, and anger, is called Sthit-prajn --- a sage of steady intellect. (2.56)

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌ । नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥2-57||

  जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है॥५७॥
Those who are not attached to anything, who are neither elated by getting desired results, nor troubled by undesired results, their intellect is considered steady. (2.57)

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥

 सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ
 योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व
 को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है॥69॥

A yogi, the person of self-restraint, remains wakeful when it is night for all others. It is night for the yogi who

sees when all others are wakeful. (2.69)
(While most people sleep and make dream plans in the night of
the illusory world, a yogi keeps awake or detached from the world while living in it.)

when most people are remain in Awake & Dream [mortal] states of consciousness Yogi-Muni lives in another eternal state of consciousness of knowledge