Tuesday, January 24, 2012

क्या सच में "आजादी बिना खड़क बिना ढाल" के मिली ? ..

क्या सच में "आजादी बिना खड़क बिना ढाल" के मिली ? ....
कृपया निम्न तथ्यों को बहुत ही ध्यान से तथा मनन करते हुए पढ़िये:-1. 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन को ब्रिटिश सरकार कुछ ही हफ्तों में कुचल कर रख देती है।2. 1945 में ब्रिटेन विश्वयुद्ध में ‘विजयी’ देश के रुप में उभरता है।3. ब्रिटेन न केवल इम्फाल-कोहिमा सीमा पर आजाद हिन्द फौज को पराजित करता है, बल्कि जापानी सेना को बर्मा से भी निकाल बाहर करता है।4. इतना ही नहीं, ब्रिटेन और भी आगे बढ़कर सिंगापुर तक को वापस अपने कब्जे में लेता है।5. जाहिर है, इतना खून-पसीना ब्रिटेन ‘भारत को आजाद करने’ के लिए तो नहीं ही बहा रहा है। अर्थात् उसका भारत से लेकर सिंगापुर तक अभी जमे रहने का इरादा है।6. फिर 1945 से 1946 के बीच ऐसा कौन-सा चमत्कार होता है कि ब्रिटेन हड़बड़ी में भारत छोड़ने का निर्णय ले लेता है?हमारे शिक्षण संस्थानों में आधुनिक भारत का जो इतिहास पढ़ाया जाता है, उसके पन्नों में सम्भवतः इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलेगा। हम अपनी ओर से भी इसका उत्तर जानने की कोशिश नहीं करते- क्योंकि हम बचपन से ही सुनते आये हैं- दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल। इससे आगे हम और कुछ जानना नहीं चाहते।(प्रसंगवश- 1922 में असहयोग आन्दोलन को जारी रखने पर जो आजादी मिलती, उसका पूरा श्रेय गाँधीजी को जाता। मगर “चौरी-चौरा” में ‘हिंसा’ होते ही उन्होंने अपना ‘अहिंसात्मक’ आन्दोलन वापस ले लिया, जबकि उस वक्त अँग्रेज घुटने टेकने ही वाले थे! दरअसल गाँधीजी ‘सिद्धान्त’ व ‘व्यवहार’ में अन्तर नहीं रखने वाले महापुरूष हैं, इसलिए उन्होंने यह फैसला लिया। हालाँकि एक दूसरा रास्ता भी था- कि गाँधीजी ‘स्वयं अपने आप को’ इस आन्दोलन से अलग करते हुए इसकी कमान किसी और को सौंप देते। मगर यहाँ ‘अहिंसा का सिद्धान्त’ भारी पड़ जाता है- ‘देश की आजादी’ पर।)
यहाँ हम 1945-46 के घटनाक्रमों पर एक निगाह डालेंगे और उस ‘चमत्कार’ का पता लगायेंगे, जिसके कारण और भी सैकड़ों वर्षों तक भारत में जमे रहने की ईच्छा रखने वाले अँग्रेजों को जल्दीबाजी में फैसला बदलकर भारत से जाना पड़ा।(प्रसंगवश- जरा अँग्रेजों द्वारा भारत में किये गये ‘निर्माणों’ पर नजर डालें- दिल्ली के ‘संसद भवन’ से लेकर अण्डमान के ‘सेल्यूलर जेल’ तक- हर निर्माण 500 से 1000 वर्षों तक कायम रहने एवं इस्तेमाल में लाये जाने के काबिल है!)
***लालकिले के कोर्ट-मार्शल के खिलाफ देश के नागरिकों ने जो उग्र प्रदर्शन किये, उससे साबित हो गया कि जनता की सहानुभूति आजाद हिन्द सैनिकों के साथ है।इस पर भारतीय सेना के जवान दुविधा में पड़ जाते हैं।फटी वर्दी पहने, आधा पेट भोजन किये, बुखार से तपते, बैलगाड़ियों में सामान ढोते और मामूली बन्दूक हाथों में लिये बहादूरी के साथ “भारत माँ की आजादी के लिए” लड़ने वाले आजाद हिन्द सैनिकों को हराकर एवं बन्दी बनाकर लाने वाले ये भारतीय जवान ही तो थे, जो “महान ब्रिटिश सम्राज्यवाद की रक्षा के लिए” लड़ रहे थे! अगर ये जवान सही थे, तो देश की जनता गलत है; और अगर देश की जनता सही है, तो फिर ये जवान गलत थे! दोनों ही सही नहीं हो सकते।सेना के भारतीय जवानों की इस दुविधा ने आत्मग्लानि का रुप लिया, फिर अपराधबोध का और फिर यह सब कुछ बगावत के लावे के रुप में फूटकर बाहर आने लगा।फरवरी 1946 में, जबकि लालकिले में मुकदमा चल ही रहा था, रॉयल इण्डियन नेवी की एक हड़ताल बगावत में रुपान्तरित हो जाती है।* कराची से मुम्बई तक और विशाखापत्तनम से कोलकाता तक जलजहाजों को आग के हवाले कर दिया जाता है। देश भर में भारतीय जवान ब्रिटिश अधिकारियों के आदेशों को मानने से इनकार कर देते हैं। मद्रास और पुणे में तो खुली बगावत होती है। इसके बाद जबलपुर में बगावत होती है, जिसे दो हफ्तों में दबाया जा सका। 45 का कोर्ट-मार्शल करना पड़ता है।यानि लालकिले में चल रहा आजाद हिन्द सैनिकों का कोर्ट-मार्शल देश के सभी नागरिकों को तो उद्वेलित करता ही है, सेना के भारतीय जवानों की प्रसिद्ध “राजभक्ति” की नींव को भी हिला कर रख देता है।जबकि भारत में ब्रिटिश राज की रीढ़ सेना की यह “राजभक्ति” ही है!***बिल्कुल इसी चीज की कल्पना नेताजी ने की थी. जब (मार्च’44 में) वे आजाद हिन्द सेना लेकर इम्फाल-कोहिमा सीमा पर पहुँचे थे। उनका आव्हान था- जैसे ही भारत की मुक्ति सेना भारत की सीमा पर पहुँचे, देश के अन्दर भारतीय नागरिक आन्दोलित हो जायें और ब्रिटिश सेना के भारतीय जवान बगावत कर दें।इतना तो नेताजी भी जानते होंगे कि-1. सिर्फ तीस-चालीस हजार सैनिकों की एक सेना के बल पर दिल्ली तक नहीं पहुँचा जा सकता, और2. जापानी सेना की ‘पहली’ मंशा है- अमेरिका द्वारा बनवायी जा रही (आसाम तथा बर्मा के जंगलों से होते हुए चीन तक जानेवाली) ‘लीडो रोड’ को नष्ट करना; भारत की आजादी उसकी ‘दूसरी’ मंशा है।ऐसे में, नेताजी को अगर भरोसा था, तो भारत के अन्दर ‘नागरिकों के आन्दोलन’ एवं ‘सैनिकों की बगावत’ पर। ...मगर दुर्भाग्य, कि उस वक्त देश में न आन्दोलन हुआ और न ही बगावत।इसके भी कारण हैं।
पहला कारण, सरकार ने प्रेस पर पाबन्दी लगा दी थी और यह प्रचार (प्रोपागण्डा) फैलाया था कि जापानियों ने भारत पर आक्रमण किया है। सो, सेना के ज्यादातर भारतीय जवानों की यही धारणा थी।दूसरा कारण, फॉरवर्ड ब्लॉक के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था, अतः आम जनता के बीच इस बात का प्रचार नहीं हो सका कि इम्फाल-कोहिमा सीमा पर जापानी सैनिक नेताजी के नेतृत्व में युद्ध कर रहे हैं।तीसरा कारण, भारतीय जवानों का मनोबल बनाये रखने के लिए ब्रिटिश सरकार ने नामी-गिरामी भारतीयों को सेना में कमीशन देना शुरु कर दिया था। इस क्रम में महान हिन्दी लेखक सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्सयायन 'अज्ञेय' भी 1943 से 46 तक सेना में रहे और वे ब्रिटिश सेना की ओर से भारतीय जवानों का मनोबल बढ़ाने सीमा पर पहुँचे थे। (ऐसे और भी भारतीय रहे होंगे।)चौथा कारण, भारत का प्रभावशाली राजनीतिक दल काँग्रेस पार्टी गाँधीजी की ‘अहिंसा’ के रास्ते आजादी पाने का हिमायती था, उसने नेताजी के समर्थन में जनता को लेकर कोई आन्दोलन शुरु नहीं किया। (ब्रिटिश सेना में बगावत की तो खैर काँग्रेस पार्टी कल्पना ही नहीं कर सकती थी!- ऐसी कल्पना नेताजी-जैसे तेजस्वी नायक के बस की बात है। ...जबकि दुनिया जानती थी कि इन “भारतीय जवानों” की “राजभक्ति” के बल पर ही अँग्रेज न केवल भारत पर, बल्कि आधी दुनिया पर राज कर रहे हैं।)
पाँचवे कारण के रुप में प्रसंगवश यह भी जान लिया जाय कि भारत के दूसरे प्रभावशाली राजनीतिक दल भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी ने ब्रिटिश सरकार का साथ देते हुए आजाद हिन्द फौज को जापान की 'कठपुतली सेना' (पपेट आर्मी) घोषित कर रखा था। नेताजी के लिए भी अशोभनीय शब्द तथा कार्टून का इस्तेमाल उन्होंने किया था।***खैर, जो आन्दोलन एवं बगावत 1944 में नहीं हुआ, वह डेढ़-दो साल बाद होता है और लन्दन में राजमुकुट यह महसूस करता है कि भारतीय सैनिकों की जिस “राजभक्ति” के बल पर वे आधी दुनिया पर राज कर रहे हैं, उस “राजभक्ति” का क्षरण शुरू हो गया है... और अब भारत से अँग्रेजों के निकल आने में ही भलाई है।वर्ना जिस प्रकार शाही भारतीय नौसेना के सैनिकों ने बन्दरगाहों पर खड़े जहाजों में आग लगाई है, उससे तो अँग्रेजों का भारत से सकुशल निकल पाना ही एक दिन असम्भव हो जायेगा... और भारत में रह रहे सारे अँग्रेज एक दिन मौत के घाट उतार दिये जायेंगे।लन्दन में ‘सत्ता-हस्तांतरण’ की योजना बनती है। भारत को तीन भौगोलिक तथा दो धार्मिक हिस्सों में बाँटकर इसे सदा के लिए शारीरिक-मानसिक रूप से अपाहिज बनाने की कुटिल चाल चली जाती है। और भी बहुत-सी शर्तें अँग्रेज जाते-जाते भारतीयों पर लादना चाहते हैं। (ऐसी ही एक शर्त के अनुसार रेलवे का एक कर्मचारी आज तक वेतन ले रहा है, जबकि उसका पोता पेन्शन पाता है!) इनके लिए जरूरी है कि सामने वाले पक्ष को भावनात्मक रूप से कमजोर बनाया जाय।



लेडी एडविना माउण्टबेटन के चरित्र को देखते हुए बर्मा के गवर्नर लॉर्ड माउण्टबेटन को भारत का अन्तिम वायसराय बनाने का निर्णय लिया जाता है- लॉर्ड वावेल के स्थान पर। एटली की यह चाल काम कर जाती है। विधुर नेहरूजी को लेडी एडविना अपने प्रेमपाश में बाँधने में सफल रहती हैं और लॉर्ड माउण्टबेटन के लिए उनसे शर्तें मनवाना आसान हो जाता है!
(लेखकद्वय लैरी कॉलिन्स और डोमेनिक लेपियरे द्वारा भारत की आजादी पर रचित प्रसिद्ध पुस्तक “फ्रीडम एट मिडनाईट” में एटली की इस चाल को रेखांकित किया गया है।)***बचपन से ही हमारे दिमाग में यह धारणा बैठा दी गयी है कि ‘गाँधीजी की अहिंसात्मक नीतियों से’ हमें आजादी मिली है। इस धारणा को पोंछकर दूसरी धारणा दिमाग में बैठाना कि ‘नेताजी और आजाद हिन्द फौज की सैन्य गतिविधियों के कारण’ हमें आजादी मिली- जरा मुश्किल काम है। अतः नीचे खुद अँग्रेजों के ही नजरिये पर आधारित कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं, जिन्हें याद रखने पर शायद नयी धारणा को दिमाग में बैठाने में मदद मिले-***सबसे पहले, माईकल एडवर्ड के शब्दों में ब्रिटिश राज के अन्तिम दिनों का आकलन:“भारत सरकार ने आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चलाकर भारतीय सेना के मनोबल को मजबूत बनाने की आशा की थी। इसने उल्टे अशांति पैदा कर दी- जवानों के मन में कुछ-कुछ शर्मिन्दगी पैदा होने लगी कि उन्होंने ब्रिटिश का साथ दिया। अगर बोस और उनके आदमी सही थे- जैसाकि सारे देश ने माना कि वे सही थे भी- तो भारतीय सेना के भारतीय जरूर गलत थे। भारत सरकार को धीरे-धीरे यह दीखने लगा कि ब्रिटिश राज की रीढ़- भारतीय सेना- अब भरोसे के लायक नहीं रही। सुभाष बोस का भूत, हैमलेट के पिता की तरह, लालकिले (जहाँ आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चला) के कंगूरों पर चलने-फिरने लगा, और उनकी अचानक विराट बन गयी छवि ने उन बैठकों को बुरी तरह भयाक्रान्त कर दिया, जिनसे आजादी का रास्ता प्रशस्त होना था।”***अब देखें कि ब्रिटिश संसद में जब विपक्षी सदस्य प्रश्न पूछते हैं कि ब्रिटेन भारत को क्यों छोड़ रहा है, तब प्रधानमंत्री एटली क्या जवाब देते हैं।प्रधानमंत्री एटली का जवाब दो विन्दुओं में आता है कि आखिर क्यों ब्रिटेन भारत को छोड़ रहा है-1. भारतीय मर्सिनरी (पैसों के बदले काम करने वाली- पेशेवर) सेना ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति वफादार नहीं रही, और2. इंग्लैण्ड इस स्थिति में नहीं है कि वह अपनी (खुद की) सेना को इतने बड़े पैमाने पर संगठित एवं सुसज्जित कर सके कि वह भारत पर नियंत्रण रख सके।
***यही लॉर्ड एटली 1956 में जब भारत यात्रा पर आते हैं, तब वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल निवास में दो दिनों के लिए ठहरते हैं। कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश चीफ जस्टिस पी.बी. चक्रवर्ती कार्यवाहक राज्यपाल हैं। वे लिखते हैं:“... उनसे मेरी उन वास्तविक विन्दुओं पर लम्बी बातचीत होती है, जिनके चलते अँग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा। मेरा उनसे सीधा प्रश्न था कि गाँधीजी का "भारत छोड़ो” आन्दोलन कुछ समय पहले ही दबा दिया गया था और 1947 में ऐसी कोई मजबूर करने वाली स्थिति पैदा नहीं हुई थी, जो अँग्रेजों को जल्दीबाजी में भारत छोड़ने को विवश करे, फिर उन्हें क्यों (भारत) छोड़ना पड़ा? उत्तर में एटली कई कारण गिनाते हैं, जिनमें प्रमुख है नेताजी की सैन्य गतिविधियों के परिणामस्वरुप भारतीय थलसेना एवं जलसेना के सैनिकों में आया ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में क्षरण। वार्तालाप के अन्त में मैंने एटली से पूछा कि अँग्रेजों के भारत छोड़ने के निर्णय के पीछे गाँधीजी का कहाँ तक प्रभाव रहा? यह प्रश्न सुनकर एटली के होंठ हिकारत भरी मुस्कान से संकुचित हो गये जब वे धीरे से इन शब्दों को चबाते हुए बोले, “न्यू-न-त-म!” ”(श्री चक्रवर्ती ने इस बातचीत का जिक्र उस पत्र में किया है, जो उन्होंने आर.सी. मजूमदार की पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑव बेंगाल’ के प्रकाशक को लिखा था।)***निष्कर्ष के रुप में यह कहा जा सकता है कि:-1. अँग्रेजों के भारत छोड़ने के हालाँकि कई कारण थे, मगर प्रमुख कारण यह था कि भारतीय थलसेना एवं जलसेना के सैनिकों के मन में ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में कमी आ गयी थी और- बिना राजभक्त भारतीय सैनिकों के- सिर्फ अँग्रेज सैनिकों के बल पर सारे भारत को नियंत्रित करना ब्रिटेन के लिए सम्भव नहीं था।2. सैनिकों के मन में राजभक्ति में जो कमी आयी थी, उसके कारण थे- नेताजी का सैन्य अभियान, लालकिले में चला आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा और इन सैनिकों के प्रति भारतीय जनता की सहानुभूति।3. अँग्रेजों के भारत छोड़कर जाने के पीछे गाँधीजी या काँग्रेस की अहिंसात्मक नीतियों का योगदान नहीं के बराबर रहा।
सो, अगली बार आप भी ‘दे दी हमें आजादी ...’ वाला गीत गाने से पहले जरा पुनर्विचार कर लीजियेगा। - Abhishek Pandey

Friday, December 2, 2011

World's Richest Government

Interesting attachment for those who are financially inclined to get a better perspective on the world's economies

We know the world's richest man is Carlos Slim Helu of Mexico,
Followed by Bill Gates and Warren Buffet of USA.
How about governments?

Which country's government is the richest (having most money that is, in US$)

If you are expecting North American and European nations, you might be disappointed.
While the countries look rich, wealthy European nations can't withstand a prolonged major financial crisis, just like Greece.

The USA might have the biggest economy, but the American government is not at all rich; in fact, it can't even take out $150 billion  if asked to now without resorting to borrowing.
To date the US government has borrowed $14 trillion!

The UK, likewise, while the country/people are rich, the government isn't.
The UK government's debt stands at $9 trillion now.

World's Richest Government

Richest governments after 2008-2009 financial crisis:

1. Peoples Republic of China
National reserves: $2,454,300,000, 000

2. Japan
National reserves: $1,019,000,000, 000

3. Russia
National reserves: $458,020,000, 000

4. Saudi Arabia
National reserves: $395,467,000, 000

5. Taiwan
National reserves: $362,380,000, 000

6. India
National reserves: $279,422,000, 000

7. South Korea
National reserves: $274,220,000, 000

8. Switzerland
National reserves: $262,000,000, 000

9. Hong Kong, China
National reserves: $256,000,000, 000

10. Brazil
National reserves: $255,000,000, 000

Here are the rest, in million US$:

11 Singapore / 203,436
12 Germany / 189,100
13 Thailand / 150,000
14 Algeria / 149,000
15 France / 140,848
16 Italy / 133,104
17 United States / 124,176
18 Mexico / 100,096
19 Iran / 96,560
20 Malaysia / 96,100
21 Poland / 85,232
22 Libya / 79,000
23 Denmark / 76,315
24 Turkey / 71,859
25 Indonesia / 69,730
26 United Kingdom / 69,091
27 Israel / 62,490
28 Canada / 57,392
29 Norway / 49,223
30 Iraq / 48,779
31 Argentina / 48,778
32 Philippines / 47,650
33 Sweden / 46,631
34 United Arab Emirates / 45,000
35 Hungary / 44,591
36 Romania / 44,056
37 Nigeria / 40,480
38 Czech Republic / 40,151
39 Australia / 39,454
40 Lebanon / 38,600
41 Netherlands / 38,372
42 South Africa / 38,283
43 Peru / 37,108
44 Egypt / 35,223
45 Venezuela / 31,925
46 Ukraine / 28,837
47 Spain / 28,195
48 Colombia / 25,141
49 Chile / 24,921
50 Belgium / 24,130
51 Brunei / 22,000
52 Morocco / 21,873
53 Vietnam / 17,500
54 Macau / 18,730
55 Kazakhstan / 27,549
56 Kuwait / 19,420
57 Angola / 19,400
58 Austria / 18,079
59 Serbia / 17,357
60 Pakistan / 16,770
61 New Zealand / 16,570
62 Bulgaria / 16,497
63 Ireland / 16,229
63 Portugal / 16,254
64 Croatia / 13,720
65 Jordan / 12,180
66 Finland / 11,085
67 Bangladesh / 10,550
68 Botswana / 10,000
69 Tunisia / 9,709
70 Azerbaijan / 9,316
71 Bolivia / 8,585
72 Trinidad and Tobago / 8,100
73 Yemen / 7,400
74 Uruguay / 8,104
75 Oman / 7,004
76 Latvia / 6,820
77 Lithuania / 6,438
78 Qatar / 6,368
79 Cyprus / 6,176
80 Belarus / 6,074
81 Syria / 6,039
82 Uzbekistan / 5,600
83 Luxembourg / 5,337
84 Guatemala / 5,496
85 Greece / 5,207
86 Bosnia and Herzegovina / 5,151
87 Cuba / 4,247
88 Costa Rica / 4,113
89 Equatorial Guinea / 3,928
90 Ecuador / 3,913
91 Iceland / 3,823
92 Paraguay / 3,731
93 Turkmenistan / 3,644
94 Estonia / 3,583
95 Malta / 3,522
96 Myanmar / 3,500
97 Bahrain / 3,474
98 Kenya / 3,260
99 Ghana / 2,837
100 El Salvador / 2,845
101 Sri Lanka / 2,600
102 Cambodia / 2,522
103 C├┤te d'Ivoire / 2,500
104 Tanzania / 2,441
105 Cameroon / 2,341
106 Macedonia / 2,243
107 Dominican Republic / 2,223
108 Papua New Guinea / 2,193
109 Honduras / 2,083
110 Armenia / 1,848
111 Slovakia / 1,809
112 Mauritius / 1,772
113 Albania / 1,615
114 Kyrgyzstan / 1,559
115 Jamaica / 1,490
116 Mozambique / 1,470
117 Gabon / 1,459
118 Senegal / 1,350
119 Georgia / 1,300
120 Panama / 1,260
121 Sudan / 1,245
122 Zimbabwe / 1,222
123 Slovenia / 1,105
124 Moldova / 1,102
125 Zambia / 1,100
126 Nicaragua / 1,496
127 Mongolia / 1,000
128 Chad / 997
129 Burkina Faso / 897
130 Lesotho / 889
131 Ethiopia / 840
132 Benin / 825
133 Namibia / 750
134 Madagascar / 745
135 Barbados / 620
136 Laos / 514
137 Rwanda / 511
138 Swaziland / 395
139 Togo / 363
140 Cape Verde / 344
141 Tajikistan / 301
142 Guyana / 292
143 Haiti / 221
144 Belize / 150
145 Vanuatu / 149
146 Malawi / 140
147 Gambia / 120
148 Guinea / 119
149 Burundi / 118
150 Seychelles / 118
151 Samoa / 70
152 Tonga / 55
153 Liberia / 49
154 Congo / 36
...
Big national reserves doesn't guarantee prosperity however, for instance, the yearly expenses for China's government is $1.11 trillion, their government must always think of economic growth and making more money.

Chinese gov't overspent $110bn last year, much on it towards modernizing their military, if it goes on like this their reserves can only last for 22 yrs.

The Malaysian gov't overspent $13bn last year, if it goes on like this their reserves can only last for 7 yrs.

The Singaporean government overspent $3bn last year, much of it rescuing their banks from financial crisis, if it goes on like this their reserves can last 68 yrs.

The Swiss govt overspent $1bn last year, if it goes on like this their reserves can last 262 yrs.

A country normally can borrow up to 100% its GDP, a very strong industrial country or very financial stable nation can borrow up to perhaps 200% its GDP, debts over 250% GDP the country is bankrupted.

Greece's Debts Is 113.40% GDP, In Danger As It Is Not Considered A Strong Industrial Or Financial Country.

Iceland Is 107.60%, Also In Crisis As It Is Not So Strong Industrial Or Financially.

Singapore Debts Is 113.10%, Not In Hot Water Due To Its Global Financial Hub Status, and Also Its Financial Strength. It's Only Dangerous For Singapore When It Reaches 200%

Japan Debts Is 189.30%, Still Under Radar As A Powerful Industrial Nation. It Needs To Panic Only At Around 200%

US Has The World Largest Debts, But It Is Only 62% Its GDP, It Is Not In Any Immediate Danger Of Bankruptcy.

Zimbabwe Debts Is 282.60% GDP, It Is A Bankrupted Nation.

Malaysia Debts Is Currently At 53.70% GDP.

Hong Kong And Taiwan Is Doing Pretty Good With Debts At 32-37% GDP

South Korea Is Even Better With Debts At 23.5% GDP

China Is Very Stable With Debts At 16.90% GDP

Russia Is Like A Big Mountain With Debts Only At 6.30% GDP
There Are Only 5 Countries With No Debt (I.E. 0%)

Brunei, Liechtenstein, Palau, Nieu, And Macau Of China.
साभार:Shashi Bhushan

Tuesday, November 29, 2011

West has to fall for the Rest to rise

COVER STORY

Source: Organiser - Weekly Date: 11/26/2011 5:56:24 PM
UPA sinking India for saving doomed Euro Zone

Don’t save Greece

West has to fall for the Rest to rise

By Dr Bharat Jhunjhunwala





Brazil, Russia, India and China are commonly referred to as BRIC nations. Their clout in the world economy is growing. Their Finance Ministers have said that they are willing to provide assistance to Greece and Europe to overcome the present economic crisis. Economies of Greece, Ireland, Italy, Portugal and Spain are in various stages of crisis. Greece leads to pack. Income of the Government is less and expenditures are more. Greece is meeting the deficit by continually borrowing more money.

European countries led by Germany and the International Monetary Fund (IMF) have provided loan of about 110 billion dollars in the last year but deficit of the Greek Government does not show any signs of receding. Now the developed countries are seeking assistance from BRIC nations as their own ability to bail out Greece is coming under stress.

The European Union had imposed condition that the Greek Government will impose new taxes, cut the number of government employees and reduce the salaries of the remaining to reduce its budget deficit. However, the people of Greece have balked. Strikes by government employees as well as private groups like taxi drivers have made it impossible for the Government to meet its commitments of deficit reduction.

Roots of the problem lie in the very structure of the European Union. Member countries of the Union have accepted a common currency. This means that individual countries have lost their ability to print notes, which is known as monetary policy. Member countries are in only control of their tax and expenditure policies, known as fiscal policy. But it is difficult to impose new taxes and cut expenditures hence the Greek Government is helpless.

Budget deficit can be bridged both by monetary and fiscal policy. Say, a government’s income is Rs 100 and expenditure is Rs 110. Monetary policy can be used to bridge this deficit. The Government can print notes of Rs 10. Goods available in the market were previously being sold for Rs 100. Now the same goods will be sold for Rs 110. This will lead to an all-round increase in price of 10 percent. This price rise will affect people of the entire country. Just as the sun lifts water from the pond, so also the government will quietly transfer income from the people to itself. There will be no need to impose taxes on any particular group or to dismiss any particular group of government employees. It is this quietness of monetary policy that makes it an effective tool when people are restive. We in India had seen this happen when the rupee was devalued in 1991 due to the balance of payments crisis. The economy attained and stabilised at a new equilibrium without much discontent because the impact was gradual and diffused.

The impact of fiscal measures is direct and harsh. The government will have to impose new taxes or cut expenditures to the extent of Rs 10 in order to balance its budget. Taxes will be imposed on some particular group of people. A tax on petrol, for example, will affect the taxi drivers directly and they may go on strike as has happened in Greece recently. Dismissal of government employees or a cut in their salaries will again hit a particular group of people directly and they may go on strike and bring the economy to a standstill. Thus Greece is on boil. The Government cannot bridge the deficit in a quiet manner through printing of notes because that power has been taken away by the European Union. The only weapon in hands of the Government is that of fiscal policies. This directly hits some people and they indulge in strikes or cripple the economy and government in other ways. This can be understood by an analogy. People bear the heat quietly if the sun is strong and the temperature rises. But the same people will shout and make a ruckus if the ceiling fan is switched off. Similarly, people bear the impact of monetary policy but they balk at fiscal measures.

The solution is to break up the European Monetary Union and the common currency-euro. Member countries can still maintain a common market as if they had a free trade agreement, they can have common standards of health and weights and measures, they can allow citizens to migrate from one country to another but their governments need the freedom to play with the monetary policy. Greece can then print notes and bridge the budget deficit. There will be inflation and the currency will be devalued but there is likely to be much less civil unrest because the impact will be slow and diffused and not be targeted at any particular group.

Finance Minister Pranab Mukherjee and Finance Ministers of other BRIC countries must reconsider their offer to help Greece and other European countries in this backdrop. The developed countries are saying that the BRIC nations must bail out Europe so that their conventional markets remain intact, their exports are not affected and their economies continue to grow. This is like the King telling the poor villagers to help out the Zamindar so that the latter continues to buy the milk and vegetables produced by them. The King forgets to tell the villagers that they will be ever mired in poverty in this process.

Many diseases cannot be treated by administering medicines. Surgery is required at times. So is the situation of the world economy today. A surgery is required to shift the global purchasing power from the developed- to developed countries so that there is balance in global consumption. Presently, 25 per cent of people living in the developed countries are consuming 75 per cent of the world resources. The need is not to maintain this ugly imbalance in consumption but to allow the economies of the developed countries to collapse. The bush growing under a big tree will be protected from the harsh sun and storm but will ever remain a bush. The only way it will grow is to cut the tree and bear the harsh sun. Similarly, the BRIC countries must bear the problems arising out of the collapse of Europe. Then only they will grow in stature in tune with their real role in the world economy.

Finance Minister Mukherjee has expressed dissatisfaction with the slow pace of reform of the global financial institutions like the IMF and the slow pace of fund flows to the developing countries. Mukherjee must understand that reform of the IMF, World Bank and the United Nations Security Council will not happen by sweet talk. Only weakening of the economic clout of the developed countries will force them to cede place to the developing countries and lay foundations of a new world economic order that is just and equitous.

Tuesday, November 8, 2011

DIVIDE & RULE

हम सब जानते हैं कि 27 फरवरी 2011 को जब बाबा रामदेव जी ने रामलीला मैदान में लाखों लोगो कि रैली की थी काला धन वापिस लाने के लिए और भ्रष्टाचार के खिलाफ जिसमे अन्ना हजारे, किरण बेदी भी आये थे|
लेकिन किसी भी न्यूज़ चैनल ने इसके बारे में एक छोटी सी खबर भी नही दिखाई बहुत हैरानी की बात है, और इसी भारत स्वाभिमान की रैली में अन्ना जी ने कहा था कि मुझे बाबा जी के इस मंच से एक नई ताकत मिली है|
उस समय बाबा रामदेव जी के साथ अन्ना जी किरण जी और भी बहुत से लोगो ने मिलकर राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा था काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ|
और इतना दबाव सरकार के उपर बढने से हो सकता था कि सरकार आने वाले कुछ सालो में काला धन वापिस लाने के लिए बड़े कदम उठा सकती थी और भारत का सारा धन उसे वापिस मिल भी जाता, लेकिन इससे आप जानते हैं सबसे बड़ा खतरा अमेरिका को था क्योंकि अमेरिका कि पूरी अर्थव्यवस्था काले धन पर ही चल रही है और अगर भारत का काला धन भारत वापिस आ जाता तो अमेरिका का इतनी मंदी आ जाती कि 1$ 7 से 8 रूपये के बराबर हो जाता और फिर विश्व कि महाशक्ति अमेरिका नही बल्कि भारत बन जाता|
जब बाबा जी कि रामलीला मैदान कि रैली को अमेरिका ने देखा तो उसके होश उड़ गए क्योंकि उस रैली को रोकने के लिए सरकार ने सारे हथकण्डे अपनाकर देख लिए थे लेकिन इन सबके बावजूद लाखों लोग उस रैली में आये थे, अमेरिका अपने भविष्ये को लेकर चिंतित था| अमेरिका इस आन्दोलन को दबाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता था क्योंकि ये उसके भविष्ये का सवाल था|
अब इन गोरों ने फिर से अपनी कूट निति "DIVIDE & RULE" को हथियार बनाया और देश कि जनता को दो हिस्सों में तोड़ दिया इसमें मोहरा बनाया गया अन्ना जी को इस काम के लिए चुना गया अरविन्द केजरीवाल को|
आप जानते हैं कि केजरीवाल का एक NGO है लेकिन आप ये नही जानते कि उसमे सबसे जयादा फंडिंग अमेरिका की फोर्ड FOUNDATION करती है और आपको जान कर हैरानी होगी कि इस फोर्ड में फंडिंग अमेरिका कि CIA करती है अब ये तो आपको बताने कि जरूरत नही होगी कि CIA कौन है और इसके साथ ही केजरीवाल को मग्सैसे अवार्ड भी दिया गया है जिसकी फंडिंग भी CIA ही करता है|

Tuesday, September 20, 2011

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का तीन दिवसीय अनशन समापन भाषण


भारत माता की जय,
मंच पर विराजमान आदरणीय सुषमा जी, आदरणीय वैंकेया जी, पूजनीय भैयू जी महाराज, सभी संप्रदाय के पूजनीय धर्मगुरु, मंच पर विराजमान सभी महानुभाव, भाइयो और बहनों।
मैंने एक पत्र लिखा था कुछ दिन पहले जो अखबारों में छपा था। उसमें मैंने कहा था कि मैं 17 तारीख को अनशन का प्रारंभ करूंगा 19 तारीख को अनशन समाप्त करूंगा। अनशन भले समाप्त होते हों लेकिन यह मिशन तेज गति से आगे बढ़ने का आज प्रारंभ है। पूर्णता की ओर जाने का ये उपक्रम है जिसे हम आगे बढ़ाना चाहते है। भाइयो और बहनों किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि सद्भावना मिशन का एक कार्य विचार न सिर्फ गुजरात को पूरे देश को आंदोलित कर देगा। किसी ने नहीं सोचा होगा।
क्या कारण है पूरे देश में सद्भभावना मिशन आखिर क्या करना चाहता है, गुजरात आखिर क्या करना चाहता है इस पर चारो तरफ एक जिज्ञासा एक अपनापन एक लगाव क्यों? मित्रों इन सवालों के जवाब हम जानते हैं। कुछ दिन पहले अन्ना हजारे जी के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन को बल मिला। क्या कारण कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरा देश उमड़ पड़ा क्यों? जवाब हम सब जानते हैं। देश के आम आदमी के मन में जो कुछ भी हो रहा है उससे वो परेशान है। वो अपने आप को अलग थलग महसूस करता है। पीड़ा सबके भीतर बडी़ है पर प्रकटीकरण का अवसर नहीं मिलता है। कोई आसरा नहीं मिलता है। और जब कहीं उसको कोई जगह दिखाई दे उसकी भीतरी आशा का जन्म होता है। वो शायद इस रास्ते से कुछ निकल आएगा इस उम्मीद से जुड़ जाता है।
ये पहली बार नहीं हुआ है। हर दस साल में हिंदुस्तान में कभी न कभी ऐसे अवसर आए हैं। जनता जनार्दन मौका देखते ही सत्य के साथ जुड़ने के लिए तैयार हो जाती है। मैं उन सारे अवसरों की गिनती कराने नहीं जा रहा हूं। हमने अपनी पूरी जिंदगी जनता की सेवा में खपाई है।
हमने घर इसलिए नहीं छोड़ा था कि सिंहासन पर बैठने के कोई सपने थे। लड़कपन में घर छोड़ा था। एक सपना लेकर छोडा़ था। किसी दुखियारे के काम आएंगे। ये जिंदगी देश के लिए काम आए। ये तन मन अपने लिए नहीं है। औरों के लिए है। ये राजनीति से नहीं होता है। माँ भारती की भक्ति से होता है। दुखियारों के दर्द को जब देखते हैं तब पीड़ा होती है। इसलिए भाइयों और बहनों हर चीज को राजनीति से जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है। हर चीज को राजनीति के तराजू से तोलने की जरूरत नहीं है।
राजनीति से भी ऊपर राष्ट्रनीति होती है। इस अनशन, सदभावना मिशन की प्रेरणा राष्ट्रनीति है राजनीति नहीं है। मित्रों, हमारा देश, हम लोग अगर गौर से सुने तो दुनिया क्या कहती है? सारे अध्यनशील लोगों का भारत पर एक आरोप है। और मैं चाहता हूं कि भारत के नागरिकों के नाते हम उस आरोप को गंभीरता से ले। विश्व में ऊंचाई पर पहुंचें। लोगों का कहना है कि पता नहीं क्या कारण है कि भारत आगे जाने के सपने नहीं देखता है।
चीन को लगता है कि हम ये करना चाहते हैं, यूरोप को लगता है कि हम ये करना चाहते हैं, अमेरिका को लगता है कि हम ये करना चाहते हैं। क्या कारण है कि हम सिकुड़ गए हैं। यदि हम ये नहीं सोच रहे हैं कि हमें क्या करना है। सपने ही नहीं है तो संकल्प की संभावना कहां से आएगी। और यदि संकल्प ही नहीं है तो जीवन को जोड़ने की इच्छा कहां से आएगी। मित्रों देश के लिए जरूरी है सपनों को संजोना। देश के लिए जरूरी है संकल्प के साथ अपने आप को खपाने की इच्छा।
ये माहौल बनाने की देश को आवश्यक्ता है। मैं गुजरात के अनुभव से कह रहा हूं। हम भी रूटीन में सरकार चला सकते थे। औरों ने भी सड़के बनाई हैं हम भी बना लेते। औरों ने भी अस्पताल बनाए हैं हम भी बना लेते। लेकिन हमने ऐसा नहीं सोचा। हमने कहा कि यह सार्वजनिक रूप से चलने वाला काम है। उसे ऐसे ही आगे बढ़ाने से कुछ नहीं होगा। हमें कुछ परिवर्तन करना है। उसके लिए हमें कुछ करना होगा। अलग। उसके लिए हमने रास्ता खोजा। 6 करोड़ गुजरातियों को जोड़ना। जब से मैंने कार्यभार संभाला है मेरे मुंह से एक मंत्र निकला है। मेरे लिए 6 करोड़ गुजराती बोलना शब्द नहीं है। यही मेरा भाव है। यही मेरी शक्ति है। इसी शक्ति से मैं गुजरात को आगे बढ़ाने के सपने देखता हूं।
हमने सपने अकेले नहीं देखे। हमने 6 करोड़ सपनों को जांचने, परखने की कोशिश की और उन 6 करोड़ सपनों से एक नई दुनिया बसाने का सोचा। हर नागरिक की आंखों में एक सपना है। वहीं सपना आपका है वही मेरा है। इसलिए हमने विकास की जो धारणा बनाई इसी आधार पर बनाई।
मैं एक कटु घटना आपको सुनाना चाहता हूं। कुछ साल पहले भारत सरकार ने जस्टिस सच्चर कमेटी का गठन किया था अल्पसंख्यकों के विकास का अध्ययन करने के लिए। जस्टिस सच्चर कमेटी की टीम ने गुजरात आकर भी अध्ययन किया। जस्टिस सच्चर की पूरी टीम की मेरे साथ एक मीटिंग हुई। उन्होंने मुझसे पूछा कि आप अपने राज्य में अल्पसंख्यकों के लिए क्या करते हैं। मैंने उनसे कहा मेरी सरकार अल्पसंख्यकों के लिए कुछ भी नहीं करती है। वो चौंक गए। ऐसा बेबाक उत्तर कोई दे सकता है। मैंने साफ साफ कहा मेरी सरकार अल्पसंख्यकों के लिए कुछ नहीं करती। मैंने कहा एक और वाक्य लिख लीजिए। मेरी सरकार बहुसंख्यकों के लिए भी कुछ नहीं करती। मेरी सरकार 6 करोड़ गुजरातियों के लिए काम करती है। यहां कोई भेदभाव नहीं है।
हर चीज को माइनारिटी-मैजोरिटी के तराजू पर तौलना। आए दिन वोट बैंक की राजनीति करना। ये रास्ता मेरा नहीं है। मेरे राज्य के सभी नागरिक मेरे हैं। उनका दुख मेरा दुख है।
मित्रों देश का दुर्भाग्य रहा है। 60 साल का ये क्रम रहा है कि सरकारें बनती हैं और बनने के बाद अगला चुनाव जीतने के लिए पांच साल उसी में खोए रहते हैं। हर कार्यक्रम, बजट को कैसे खर्च करना, विकास करना तो कैसे करना, लेकिन इस सबके बीच एक ही सवाल नेताओं के मन में रहता है कि काम कैसे करे कि अगला चुनाव जीते। यही चलता आ रहा है।
वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित अर्थरचना चलने लगी है। वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित होकर विकास योजनाएं बन रही है। उसका असर ये हुआ कि देश में विकास नहीं हुआ। छुटपुट हो रहे हैं। देश का पूरा हेल्थ सेक्टर सुधारना है कोई नहीं सोच रहा है।
ये 6० साल हमारे बर्बाद हो गए हैं। गुजरात इस सोच से बाहर निकला है। हमने सोचा कि हम चुनाव जीतने के लिए सरकार नहीं चलाएंगे। मित्रों इसके लिए बहुत ताकत लगती है। मैं भाग्य वाला इंसान हूं मुझे कोई परवाह नहीं है।
तब हम फैसले ले पाए। यदि मुझे कृषि विकास करना है तो हर किसान की वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखते हुए सोचना होगा कि हम क्या कर सकते हैं। मई जून के 44 डिग्री तापमान में हमारी राज्य सरकार के कर्मचारी किसानों के पास जाते हैं। यह इसी का परीणाम है कि गुजरात जो कभी अकाल पीडि़त था वो अब कृषि विकास में अग्रणी है।
वर्ल्ड बैंक की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि विकास के लिए यदि मॉडल के रूप में देखना है तो गुजरात को देखिए। अगर हम सिर्फ राजनीतिक तौर तरीकों से सोचते रहते तो स्थितियां नहीं बदलती।
उद्योग गुजरात में अनिवार्य कर दिया गया है। कुछ लोगों को रोजी रोटी मिल रही है। औद्योगिक क्षेत्र में विकास कैसे होता था। कोई आ गया है तो ठीक है नहीं आया तो ठीक है। हमने एक अभियान चलाया कि जाओगे तो कहां जाओगे, गुजरात ही आना पड़ेगा। हमने ऐसा माहौल बनाया कि सभी उद्योगों को गुजरात आना पड़ा।
हमने एक मूलभूत बात जो की है वो हिंदुस्तान की किसी भी सरकार से अलग है उसमें कोई आसमान से तारे लाने वाला विज्ञान नहीं है। छोटी सी समझ की बात है। यदि विकास करना है तो सरकारों से नहीं होगा। जनता जनार्दन को जोड़ दो अपने आप सब बढ़ जाएगा। हमने कोई काम ऐसा नहीं किया कि जनता एक ओर चलती हो सरकार दूसरी ओर चलती है। हमने सिर्फ जनता को जोड़ा। गुजरात की तेज गति से प्रगति की मूल ताकत जनभागिदारिता है।
देश युवा है हम कहते हैं लेकिन वो देश के काम आ रहा है क्या। युवा देश के काम आए ऐसा हम कुछ कर पाए क्या। यदि बीसवी शताब्दी के अंत से पहले ऐसा कुछ सोच लिया होता तो आज भारत कहां का कहां होता।
प्लानिंग कमीशन की हर मीटिंग में मुझसे एक सवाल जरूर पूछा जाता है। मोदी जी जनभागीदारी में कोई नया काम किया हो तो जरूर बताकर जाइये। मेरी प्लानिंग कमीशन में एक भी बैठक ऐसी नहीं हुई जब मुझसे यह प्रश्न नहीं पूछा जाता। जब मैं जनभागीदारिता की बात करता हं तो 6 करोड़ गुजराती मेरे लिए भगवान होते हैं। मैं पुजारी की तरह उनकी पूजा में लगा होता हूं।
एक सवाल किया जा रहा है कि सद्भावना मिशन में सभी संप्रदायों के लोग कैसे आए ये प्रश्न पूछा जा रहा है। ये प्रश्न इसलिए हैं क्योंकि पिछले दस साल में उ न्हेंने सत्य नहीं देखा। वो झूठ में जी रहे थे। ये सभी संप्रदाय के लोग यहां हैं। यह विश्वास रातों रात पैदा नहीं हुआ है। हमने दस साल तपस्या की है। 6 करोड़ गुजरातियों के मंत्र का हमने दिन रात जाप किया है तब यह संभव हो सका है। नरेंद्र मोदी वोट बैंक की राजनीति नहीं करते हैं लेकिन हमारी चिंता सबसे ज्यादा करते हैं यह भरोसा हमने दिया है।
आम आदमी को चाहिए शांति। यहां किसी मैजोरिटी की शांति का बात नहीं हो रही है। शांति सबको चाहिए। गरीब को और ज्यादा चाहिए। अशांति होती है तो गरीबों की रोजी रोटी मर जाती है। उनके बच्चे भूखे सोते हैं। सुख चैन की जिंदगी आज हर गुजराती जी रहा है। इससे भरोसा पैदा हुआ है। राज्य का मुख्यमंत्री घर घर जाकर कह रहा है कि अपनी बेटी को पढ़ाओ। वो नहीं देखता कि वो किस संप्रदाय के घर में है। शत प्रतिशत- जब शत प्रतिशत की बात होती है तो कोई विशेष नहीं होता है ।
सबका साथ सबका विकास नारा नहीं है। हम एक दशक इस पर चले हैं। सद्भभावना मिशन की आत्मा यही है। कुछ लोग सवाल कर रहे हैं कि आज ही जरूरत क्यों पड़ी। हम तो इस पर चलते आए हैं। लेकिन सफलता मिलने के बाद लगा कि इस मॉडल को उजागर करने की जरूरत है। गुजरात के विकास के मॉडल की चर्चा सभी लोग करते हैं।
गुड गवर्नेंस के विषय में भी गुजरात पर सवाल नहीं उठते हैं। सबको लगता है कि गुड गवर्नेंस है विकास है। अब सवाल नहीं उठते हैं। लेकिन इसके पीछे के राज पर किसी का ध्यान नहीं जाता था। इस सद्भभावना मिशन से मैं उस ताकत के बारे में दुनिया को बताना चाहता हूं जिससे गुजरात का विकास हुआ है। इस सद्भभावना मिशन पर हम दस साल से चल रहे हैं। सबको साथ जोड़कर चलते चलते जो हासिल किया है मैं आज नम्रतापूर्वक तीन दिन के अनशन के बाद मन की पवित्रता के साथ देश के विकास में सोचने वाले लोगों को निमंत्रण देता हूं अपने साथ जुड़ने का। जैसे सुषमा जी कह रही थी कि हमारे विरोधी दल के लोग तारीफ कर रहे हैं। सबका भला सहज प्रक्रिया है। मैं आग्रह करता हूं कि देश और दुनिया गुजरात को देखे तो हमारे सद्भभावना मिशन को भी देखे। ये ऐसा मॉडल है जिसमें जनशक्ति और विकास की यात्रा को जोड़कर के चलना है। लेकिन कभी कभी क्या होता है। हम कितना भी काम क्यों न करे जब तक विराट के दर्शन न हो दुनिया के गले के नीचे चीजें उतरती नहीं है। ये तीन दिन का अनशन दुनिया को उस विराट के दर्शन कराने का छोटा सा कदम था। अगर ये मैं न करता, अपनी सात्विक शक्ति को उसके साथ न जोड़ता। लाखों लोगों का मुझे आशीर्वाद न मिलता तो दुनिया का ध्यान इस ओर जाने वाला नहीं था।
एक्‍शन बोलता है और मैं एक्‍शन में विश्वास करता हूं। लीडरशिप की कसौटी एक्‍शन पर निर्भर करती है। आज हमने दुनिया को दिखाया कि ये रास्ता है। सबको जोड़ने का सबको साथ लेकर चलने का। जब तक हम वोट बैंक की राजनीति से ऊपर नहीं उठते हम देश का विकास नहीं कर सकते।
मेरे दिल में बहुत पीड़ा है। जब तक मैं सरकार में नहीं था तब तक मैं भी ओरों की तरह सोचता था क्या करोगे अपना देश तो ऐसा ही है। लेकिन दस साल के अनुभव से कह सकता हूं कि यही सरकार, यही अफसर, यही फाइलें…यदि उसके बाद भी इस सब के साथ जनता को जोड़ दे तो विकास किया जा सकता है। गुजरात ने करके दिखाया। हमको इसी रास्ते पर आगे बढ़ना है।
इन दिनों गेमचेंजर शब्द का खूब प्रयोग हो रहा है। मैं अपने हर गांव के हर व्यक्ति को गेमचेंजर बनाना चाहता हूं। सद्भभावना मिशन से मैंने अपना प्रयास शुरु किया है। एक मॉडल दुनिया के सामने रखा है। ये सद्भभावना मिशन आगे बढ़ने वाला है।
मैं जिम्मेदारी के साथ ये घोषणा कर रहा हूं कि जैसे मैंने ये तीन दिन का अनशन किया मैं इसी तरह सभी जिलों में जाउंगा हर जिले में एक-एक दिन बैठूंगा। सुबह से शाम तक बैठूंगा। जनता के बीच में बैठूंगा। और जैसे ये तीन दिन मैंने देखा है हर जिले में इस भाव को और शक्तिशाली करूंगा। और भूखे रह कर करूंगा। क्योंकि मैंने इसके फल देखे हैं। एकता, शांति, भाईचारा इसके फल को मैंने महसूस किया है। इस सद्भभावना को और अधिक ताकतवर बनाना मेरा सपना है। मैं आप सब को जोड़ कर, सभी जिलों में जाकर के इस भाव को और अधिक मजबूत करना चाहता हूं। जैसे जैस कार्यक्रम बनेगा आप सबको जानकारी दी जाती रहेगी।
मेरे सबसे बड़ी शक्ति ही मेरा कमिटमेंट हैं। कई लोगों को लगता है गुजरात में बहुत कुछ हो गया लेकिन मैं इससे संतुष्ट नहीं हूं। मुझे गुजरात को और आगे ले जाना है। और नए सपने संजोंने हैं। और नई शक्ति जुटानी है। उसी को लेकर आगे बढ़ना है।
हिंदुस्तान में जो निराशा का माहौल है उसके गुजरात ने बदला है। जो हो नहीं सकता उसे गुजरात ने करके दिखाया है। ये लोकतंत्र है। हर एक की अपनी राय होती है अपनी अभिव्यक्ति होती है। लेकिन हमने हमारे लक्ष्य को कभी भी ओझिल नहीं होने देना है। हमे अपने लक्ष्य को हमेशा हमेशा अपनी आंखों में रखना है।
हम जो कुछ भी कर रहे हैं उसमें हमारा मंत्र रहा है भारत के विकास के लिए गुजरात का विकास। भले उद्योग गुजरात में मिले लेकिन रोजगार देशभर के लोगों को मिलता है। अगर गुजरात का किसान कपास पैदा करता है तो वो कोयमबटूर में प्रोसेस होकर वहां के लोगों को भी रोजगार देता है।
भारत मां की सेवा करने के लिए हम गुजरात का विकास करके मां भारती के चरणों में अर्पित करना चाहते हैं। मुझे जनता का आशीर्वाद चाहिए। मुझे संतों महात्माओं का आशीर्वाद चाहिए। इस सद्भभावना मिशन को आगे बढ़ाने के लिए मैं राज्य के हर जिले में जाने वाला है। मैं दुनिया को दिखाना चाहता हूं कि हमने जनशक्ति को कैसे जोड़ा है। मैं दुनियाभर को लोगों को गुजरात का अध्यन करने के लिए आमंत्रित करता हूं। नकारात्मकता पर हमारा ध्यान नहीं है। हम सपनों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं।
मैंने सोचा भी नहीं था कि देशभर से लोग आएंगे। अब पूरा देश जुड़ रहा हैं। मैं मानता हूं कि विकास जनआंदोलन बनना चाहिए। यदि विकास जनआंदोलन बनता है तो दुनिया की कोई ताकत हमें नहीं रोक सकती। हम इंतेजार नहीं कर सकते। हमे नई ऊंचाइयों को छूना है। आईये हम विकास की नई यात्रा की शुरुआत करे।
मैं व्यक्तिगत रूप से आपका आभारी हूं कि आपने मुझे प्रेम दिया, आशीर्वाद दिया, शक्ति दी। इसी शक्ति को नमन करते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
जय-जय गुजरात।

Friday, September 16, 2011

Arthakranti - clearing few doubt

Dear all,

Pls see the answers below and fine tune if necessary...

(1)Say a person X borrows Rs 1 crore and repays Rs 1.01 crore 1 month later
with 1% per month interest. Then will transaction tax be 2% of Rs 100,00 or

2% of Rs 1 crore or 2% of Rs 1.01 crore or 2% of Rs 2.01 crore . If it is 2%

of Rs 200,000 , then it is income tax of 2% and not really transaction tax.

And govt cant run with 2% income tax. And if tax is 2% on Rs 2 cr, then whole

economy will collapse. Because even wealthy companies like Reliance have to

sometimes borrow 100s of crores of rupees for 1-2- weeks to meet day-to-day

requirement . There is a whole area called "over night borrowings" where Rs 1

cr is borrowed for 1-2 days and returned with interest of mere Rs 2000 to Rs

3000 !! Paying even 0.1% on whole transaction will just kill whole business.



Ans: Dear Nimesh, thanks for your keen interest and queries. All these queries are related to the post-implementation scenario and impact of the proposal on various financial transactions.
a. The implementation of the AK proposal will influence practically every aspect of the economy as we know it today. Many of these practices are based on and have evolved out a severe scarcity of money in the system. Due to the huge number of cash transactions, our banking system is grossly under-utilised and therefore the creation of bank money (through the mechanism of credit expansion) is extremely poor. This is the root cause of the entire phenomenon of borrowing at exorbitant rates of interest for short and very short tenures. The entire 'overnight borrowing' market is merely a response to scarcity (and resulting demand) for funds. Once implemented, the sheer volumes of banking transactions will create abundant money in the banking system and scarcity will be history. We have the numbers to prove this (please see the presentation on the website) and this has been accepted wholeheatedly by very senior economists.
b. Secondly, presently the banking industry depends on interest rate arbitrage (difference between borrowing and lending rates) for its survival. After implementation of the AK proposal, banks will have abundant revenue through the proposed model, as their fee for preforming the crucial function of revenue collection on behalf of the government. This will end their dependence on interest rate differences for revenue and actually free them to lower interest rates to globally competitive levels.

c. After all currency notes above (say) Rs 50 denomination as well as all direct and indirect taxes are abolished and a one-time amnesty is announced to allow all the cash circulating outside the system, to enter the banking system without fear, a massive amount of money will enter the system. This money will then be available for all kinds of expenditure, investment and savings, without fear of painful tax.

d. The cumulative effect of all the three points above will result in plenty of funds for business - directly or through indirect investment instruments and modes (equity/debt) at very low cost.

As a result, most of these practices of today (which are born out of scarcity) will simply vanish, since they will no longer be relevant.

I suggest you re-check the numbers in the example you have stated above. There seems to be some confusion.

It is unnecessary to get stuck on the 2% tax rate. We have stated at each stage that this is a notional figure, simply used to put across the logic of the proposal. Our numbers show indisputably that the real tax rate will be much lower - perhaps closer to 0.5%, which means 50 paise on 100 Rs. Hence, getting into debates based on a 2% rate (or the percentages of various shares etc) is quite pointless at this stage. The Government of the day will have to determine the rate and sharing percentages based on the day-to-day situation, in a dynamic manner. The tax payers will not even realise these minute changes (Ref - Securities Transaction Tax in force currently) and the tax payout will be too small and painless to even bother to evade. Compliance will be far more convenient.



(2) Consider production chain from wheat to bread. The wheat goes from 7 to

10 hands. From farmers -> mandi -> town wholesaler -> atta manufacturer ->

bread manufacturer -> bakery shop -> end customer. If there is a transcation

tax of 2% at each level, then effective sales tax on wheat is 12% . And this

is simple item like bread. In complex item like TV or car, from iron ore to

car chain for some parts will be 50-100 entities long. And in between , there

are several traders who are important as they do storage work. So will

transaction tax be 2% at each level? And finaly tax component will become 50%

to 100% depending on length of the chain.

Ans: The very fact that a raw material or commodity has to change ownership so many times before it reaches the end consumer points to severe inefficiencies in our systems of trade and distribution. This has been known and debated for a long time and everyone agrees that it is best in everyone's interest that the distribution (or aggregation) chains are rationalised and simplified and goods change hands for the least possible times. Please note that when the large MNC Retail chains come in, this is exactly what will happen. The Government has recently approved their entry through FDI.

Secondly, the huge number of people employed in trading and broking is a direct result lack of employment opportunities and employable skills for Indian youth. Trading and Broking are certainly necessary services, but the excessive manpower engaged in this profession is an indicator of lack of proper education and vocational training. It also indicates other failures of our system - the failure to encourage and enable entrepreneurship, failure to create sufficient jobs and failure to provide cheap and easy access to capital for business startup.

Lastly, for complex goods such as cars etc, the current cascading effect of all indirect taxes, excise, octroi, service taxes, taxes on taxes etc. at each stage add up to a very high tax impact (exceeding 100% in many cases). Post implementation, indirect taxes will be abolished and only a minuscle banking transaction tax will apply at the stages where ownership changes hands. The cumulative effect of all these taxes is expected to be far lower than what we are paying today. Anybody who is interested and has access to manufacturing data can do a case study of a motor cycle or car for example, and see for himself the dramatic reduction in final cost of manufacture.

Also, we need to remember that the very fact that transactions are taxed will influence businesses to restructure their supply lines so as to minimise incidence of tax - this will bring in the 'rationalising' effect.




(3)If the final tax is 10% to 50% of item cost, then there will be parallel

"without bill" economy, where good will be 10% to 50% cheaper. And this

economy can function with gold, silver or dollar as medium. A cost difference

of 5% is sufficient to generate "without bill" economy.

Ans: I suggest you reconsider this statement. Is it possible for a clever seller of finished goods, say a mobile phone, and a clever buyer to jointly evade all accumulated tax at the point of sale? The phone seller will get the phone at Rs x and will sell it after a mark up, which is his trading profit. How can he possibly give the buyer a discount for all taxes paid before he bought the phone? The only tax that he can absorb or pass on (depending on market conditions) is the transaction tax for his level - far too small to bother avoiding. Secondly, is it genuinely possible for anyone to trade for goods and services with gold or silver? How many people will be able to decide whether the gold or silver is genuine? Will it be safe to carry gold and silver in person in our pockets and purses all the time? How will you break off a small piece of gold or silver to make a small purchase? If someone steals my gold or silver, what is the proof that it actually belonged to me? Money came onto existence precisely to overcome these challenges, and it is quite impossible to turn the clock back and go back to gold coins and barter.

As for dollars, anybody who wants to transact in a foreign currency inside the country will only have himself to blame for the consequences. We have quite strict laws governing use of foreign currency. It would be impossible to use dollars for day-to-day transactions, since most people would not touch them, given the exchange rate mechanism risk. Dollars would also carry all the risks that a normal high denomination note carries, including fake currency which cannot possibly be distinguished without high tech machines. It would be quite pointless to take all these risks to merely evade the negligible tax rate of this proposal.

Thanks once again for your interest. If you have not attended the AK presentation do get in touch with us and keep a watch on the website for our frequent events. It would be very helpful to interact in person with one of our volunteers to get full clarity on the proposal. Please feel free to ask questions - no matter how small they may seem. It is extremely important to understand it properly before you carry this thought as your own...


Rgds

Sunday, August 21, 2011

गज़ब ईमानदारी का गज़ब खुलासा...!!!!!

रामलीला मैदान में अभी-अभी खत्म हुई प्रेस कांफ्रेंस में अरविन्द केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने साफ़ और स्पष्ट जवाब देते हुए लोकपाल बिल के दायरे में NGO को भी शामिल किये जाने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है. विशेषकर जो NGO सरकार से पैसा नहीं लेते हैं उनको किसी भी कीमत में शामिल नहीं करने का एलान भी किया. ग्राम प्रधान से लेकर देश के प्रधान तक सभी को लोकपाल बिल के दायरे में लाने की जबरदस्ती और जिद्द पर अड़ी अन्ना टीम NGO को इस दायरे में लाने के खिलाफ शायद इसलिए है, क्योंकि अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया,किरण बेदी, संदीप पाण्डेय ,अखिल गोगोई और खुद अन्ना हजारे भी केवल NGO ही चलाते हैं. अग्निवेश भी 3-4 NGO चलाने का ही धंधा करता है. और इन सबके NGO को देश कि जनता की गरीबी के नाम पर करोड़ो रुपये का चंदा विदेशों से ही मिलता है.इन दिनों पूरे देश को ईमानदारी और पारदर्शिता का पाठ पढ़ा रही ये टीम अब लोकपाल बिल के दायरे में खुद आने से क्यों डर/भाग रही है.भाई वाह...!!! क्या गज़ब की ईमानदारी है...!!!

इन दिनों अन्ना टीम की भक्ति में डूबी भीड़ के पास इस सवाल का कोई जवाब है क्या.....?????

जहां तक सवाल है सरकार से सहायता प्राप्त और नहीं प्राप्त NGO का तो मई बताना चाहूंगा कि....

भारत सरकार के Ministry of Home Affairs के Foreigners Division की FCRA Wing के दस्तावेजों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2008-09 तक देश में कार्यरत ऐसे NGO's की संख्या 20088 थी, जिन्हें विदेशी सहायता प्राप्त करने की अनुमति भारत सरकार द्वारा प्रदान की जा चुकी थी.इन्हीं दस्तावेजों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2006-07, 2007-08, 2008-09 के दौरान इन NGO's को विदेशी सहायता के रुप में 31473.56 करोड़ रुपये प्राप्त हुये. इसके अतिरिक्त देश में लगभग 33 लाख NGO's कार्यरत है.इनमें से अधिकांश NGO भ्रष्ट राजनेताओं, भ्रष्ट नौकरशाहों, भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों, भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों के परिजनों,परिचितों और उनके दलालों के है. केन्द्र सरकार के विभिन्न विभागों के अतिरिक्त देश के सभी राज्यों की सरकारों द्वारा जन कल्याण हेतु इन NGO's को आर्थिक मदद दी जाती है.एक अनुमान के अनुसार इन NGO's को प्रतिवर्ष न्यूनतम लगभग 50,000.00 करोड़ रुपये देशी विदेशी सहायता के रुप में प्राप्त होते हैं. इसका सीधा मतलब यह है की पिछले एक दशक में इन NGO's को 5-6 लाख करोड़ की आर्थिक मदद मिली. ताज्जुब की बात यह है की इतनी बड़ी रकम कब.? कहा.? कैसे.? और किस पर.? खर्च कर दी गई. इसकी कोई जानकारी उस जनता को नहीं दी जाती जिसके कल्याण के लिये, जिसके उत्थान के लिये विदेशी संस्थानों और देश की सरकारों द्वारा इन NGO's को आर्थिक मदद दी जाती है. इसका विवरण केवल भ्रष्ट NGO संचालकों, भ्रष्ट नेताओ, भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों, भ्रष्ट बाबुओं, की जेबों तक सिमट कर रह जाता है. भौतिक रूप से इस रकम का इस्तेमाल कहीं नज़र नहीं आता. NGO's को मिलने वाली इतनी बड़ी सहायता राशि की प्राप्ति एवं उसके उपयोग की प्रक्रिया बिल्कुल भी पारदर्शी नही है. देश के गरीबों, मजबूरों, मजदूरों, शोषितों, दलितों, अनाथ बच्चो के उत्थान के नाम पर विदेशी संस्थानों और देश में केन्द्र एवं राज्य सरकारों के विभिन्न सरकारी विभागों से जनता की गाढ़ी कमाई के दसियों हज़ार करोड़ रुपये प्रतिवर्ष लूट लेने वाले NGO's की कोई जवाबदेही तय नहीं है. उनके द्वारा जनता के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई के भयंकर दुरुपयोग की चौकसी एवं जांच पड़ताल तथा उन्हें कठोर दंड दिए जाने का कोई विशेष प्रावधान नहीं है. लोकपाल बिल कमेटी में शामिल सिविल सोसायटी के उन सदस्यों ने जो खुद को सबसे बड़ा ईमानदार कहते हैं और जो स्वयम तथा उनके साथ देशभर में india against corruption की मुहिम चलाने वाले उनके अधिकांश साथी सहयोगी NGO's भी चलाते है लेकिन उन्होंने आजतक जनता के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई के दसियों हज़ार करोड़ रुपये प्रतिवर्ष लूट लेने वाले NGO's के खिलाफ आश्चार्यजनक रूप से एक शब्द नहीं बोला है, NGO's को लोकपाल बिल के दायरे में लाने की बात तक नहीं की है.

इसलिए यह आवश्यक है की NGO's को विदेशी संस्थानों और देश में केन्द्र एवं राज्य सरकारों के विभिन्न सरकारी विभागों से मिलने वाली आर्थिक सहायता को प्रस्तावित लोकपाल बिल के दायरे में लाया जाए. (कृपया इस पोस्ट को जितने ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकते हों उतने ज्यादा लोगों तक पहुंचाइये.)
by Satish Chandra Mishra
via Tajinder pal singh (@tajinderbagga)