Saturday, March 9, 2013

मीराबाई के भजन II


पायो जी मेनें,  नाम रतन धन पायो
वस्तु अमोलक दी  की मेरे सदगुरु 
किरपा कर अपणायों
पायो जी मेनें, 
 नाम रतन धन पायो
जनम जनम की पु्ंजी पाई
जग में सबै खोबायो
खरचे नहीं, कोई चोर न लेवै
दिन दिन बढ़त सवायौ
पायो जी मेनें,
 नाम  रतन धन पायो
सत की नाव, खेवटिया सदगुरु 
भव सागर तरि आयौ
मीरा के प्रभु गिरधर नागर
हरिख हरिख जस गायौ
पायो जी मेनें, 
 नाम रतन धन पायो

Tuesday, March 5, 2013

मीराबाई -I


मोरी लागी लटक गुरु चरणकी॥ध्रु०॥

चरन बिना मुज कछु नही भावे। झूंठ माया सब सपनकी॥१॥

भवसागर सब सुख गयी है। फिकीर नही मुज तरुणोनकी॥२॥

मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। उलट भयी मोरे नयननकी॥३॥

Monday, March 4, 2013

Chanakya Sutra



Chanakya Sutra
 has 572 sutras. These are the first 10 sutras from Chanakya Sutra:
1. Sukhasya moolam Dharmah
Meaning – The basis of “sukha” or all true pleasantness  is “dharma” or righteous conduct.
2. Dharmasya moolam Arthah
Meaning- The basis of all “dharma” is “artha” or wealth.
3. Arthasya moolam Rajyam
Meaning – The basis of all “artha” is “rajya” or the State.
4.  Rajyasya moolam Indriya Jayah
Meaning – The basis for the stability of the State lies in control over the “indriya“ or sense faculties providing pleasure.
5.  Indriyajayasya moolam Vinayah
Meaning – The basis for control over the sensual faculties is in “vinay” or humility.
6. Vinayasya moolam Vruddhopasevah
Meaning – The basis for humility is devotion to those grown old through wisdom.
7. Vruddhopasevaya Vijnanam
Meaning – Through devotion to the wise, one attains proficiency with the maximum efficiency.
8. Vijnanena atmaanam Sampadyet
Meaning – It is imperative for all the functionaries of the State to perform their duties with the maximum efficiency.
9. Samapaditatma jitatmama Bhavati
Meaning – To perform State duties with the maximum efficiency, the functionaries of the State must learn to control their sensual needs, and maximize their internal potential.
10. Jitatma sarvarthe Sanyujyate
Meaning – Those who have vanquished their baser selves will become prosperous naturally, can retain their prosperity, and (will) be successful in their endeavors.
सुखस्य मूलं धर्मः , धर्मस्य  मूलं  अर्थः
अर्थस्य  मूलं  राज्यं  , राज्यस्य मूलं  इन्द्रिय  जयः
इन्द्रियाजयस्य  मूलं  विनयः, विनयस्य मूलं  वृद्धोपसेवः
वृद्धोपसेवाय  विग्न्यानं , विग्न्यानेनं आत्मानं  सम्पद्येत
समपदितात्म जितात्मम  भवति, जितात्मा  सर्वार्थे  संयुज्यते

Saturday, February 23, 2013

आचार्य चाणक्य के 15 सूक्ति वाक्य ---- simple version



1) "दूसरो की गलतियों से सीखो अपने ही ऊपर प्रयोग करके सीखने को तुम्हारी आयु कम पड़ेगी."

2)"किसी भी व्यक्ति को बहुत ईमानदा
र नहीं होना चाहिए ---सीधे वृक्ष और व्यक्ति पहले काटे जाते हैं."

3)"अगर कोई सर्प जहरीला नहीं है तब भी उसे जहरीला दिखना चाहिए वैसे दंश भले ही न दो पर दंश दे सकने की क्षमता का दूसरों को अहसास करवाते रहना चाहिए. "

4)"हर मित्रता के पीछे कोई स्वार्थ जरूर होता है --यह कडुआ सच है."

5)"कोई भी काम शुरू करने के पहले तीन सवाल अपने आपसे पूछो ---मैं ऐसा क्यों करने जा रहा हूँ ? इसका क्या परिणाम होगा ? क्या मैं सफल रहूँगा ?"

6)"भय को नजदीक न आने दो अगर यह नजदीक आये इस पर हमला करदो यानी भय से भागो मत इसका सामना करो ."

7)"दुनिया की सबसे बड़ी ताकत पुरुष का विवेक और महिला की सुन्दरता है."

8)"काम का निष्पादन करो , परिणाम से मत डरो."

9)"सुगंध का प्रसार हवा के रुख का मोहताज़ होता है पर अच्छाई सभी दिशाओं में फैलती है."

10)"ईश्वर चित्र में नहीं चरित्र में बसता है अपनी आत्मा को मंदिर बनाओ."

11) "व्यक्ति अपने आचरण से महान होता है जन्म से नहीं."

12) "ऐसे व्यक्ति जो आपके स्तर से ऊपर या नीचे के हैं उन्हें दोस्त न बनाओ,वह तुम्हारे कष्ट का कारण बनेगे. सामान स्तर के मित्र ही सुखदाई होते हैं ."

13) "अपने बच्चों को पहले पांच साल तक खूब प्यार करो. छः साल से पंद्रह साल तक कठोर अनुशासन और संस्कार दो .सोलह साल से उनके साथ मित्रवत व्यवहार करो.आपकी संतति ही आपकी सबसे अच्छी मित्र है."

14) "अज्ञानी के लिए किताबें और अंधे के लिए दर्पण एक सामान उपयोगी है .
15) "शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है. शिक्षित व्यक्ति सदैव सम्मान पाता है. शिक्षा की शक्ति के आगे युवा शक्ति और सौंदर्य दोनों ही कमजोर हैं .

15) "शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है. शिक्षित व्यक्ति सदैव सम्मान पाता है. शिक्षा की शक्ति के आगे युवा शक्ति और सौंदर्य दोनों ही कमजोर हैं .

Sunday, October 21, 2012

कबीर के दोहे -3

24) साँई इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय । मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भुखा जाय॥

25) जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
  तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥

26) उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास। तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥

27) सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ। 
धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाइ॥
28) साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय। आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥ 
29) बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिल्य कोए। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोए॥
30)जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। प्रेम गली अति सॉंकरी, तामें दो न समाहिं।।

31) सोना, सज्‍जन, साधुजन, टूटि जुरै सौ बार। 
दुर्जन कुंभ-कुम्‍हार के, एकै धका दरार।।

32)जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान।।
33) माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर । कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥


34)जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल। तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥
35) रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय । हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥
36)माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि ईवै पडंत। 
कहै कबीर गुरु ज्ञान ते, एक आध उबरंत॥

कबीर के दोहे 2

 12) माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर । कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥
 13) कबीर माला काठ की, कहि समझावै तोहि मन न फिरावै आपणां, कहा फिरावै मोहि 
 
14) कबीरा माला मनहि की, और संसारी भीख।  माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख।
15) कबीरा जपना काठ की, क्या दिखलावे मोय। हृदय नाम न जपेगा, यह जपनी क्या होय।

16) 
क्या भरोसा देह का, बिनस जात छिन मांह।  सांस-सांस सुमिरन करो और यतन कुछ नांह।
 17) सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में करते याद । कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥

 18) साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय । मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥
 17) धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय । माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥
 19) कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और । हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥

 20) जहां आप तहां आपदा, जहां संषय तहां रोग।

 21) रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय । हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥
 22) दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय। जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥
 23) बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥


Tuesday, October 16, 2012

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