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Tuesday, June 25, 2013

कबीर के दोहे -5

50) हीरा पड़ा बाज़ार में, रहा छार लपटाय। बहुतक मूरख चलि गए, पारख लिया उठाय॥
51)हीरा तहां न खोलिए जहाँ कुंजड़ों की हाट I सहजे गांठी बांधि के लगिये अपनी बाट II
52) कबीरा ते नर अन्ध है, गुरू को कहते और। हरि रूठे गुरू ठौर है, गुरू रूठै नहीं ठौर।

53) कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान। जम जब घर ले जायेगें, पड़ी रहेगी म्यान।

54)जिस मरने से जग डरे, मेरे मन में आनंद | कब मरू कब पाऊ, पूरण परमानन्द ||
55)कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि कर तन हार। साधु वचन जल रूप, बरसे अमृत धार।

56) जग में बैरी कोउ नहीं, जो मन सीतल होय इस आपा को डारि दे, दया कर सब कोय

57) कामी,क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति न होय। भक्ति करे कोई सूरमा, जाति वरन कुल खोय।
58) कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय। टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय ।
59) कबीरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा। कै सेवा कर साधु की, कै गोविंद गुन गा।

Sunday, October 21, 2012

कबीर के दोहे -3

24) साँई इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय । मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भुखा जाय॥

25) जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
  तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥

26) उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास। तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥

27) सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ। 
धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाइ॥
28) साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय। आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥ 
29) बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिल्य कोए। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोए॥
30)जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। प्रेम गली अति सॉंकरी, तामें दो न समाहिं।।

31) सोना, सज्‍जन, साधुजन, टूटि जुरै सौ बार। 
दुर्जन कुंभ-कुम्‍हार के, एकै धका दरार।।

32)जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान।।
33) माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर । कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥


34)जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल। तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥
35) रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय । हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥
36)माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि ईवै पडंत। 
कहै कबीर गुरु ज्ञान ते, एक आध उबरंत॥